मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

मेरा होंसला आफजाई करें...

मेरे प्रिय साथियों मैं बहुत दिन से अपने ब्लोग पर नहीं आया। असल में एक तो अभी अभी नई सफर की शुरूआत की थी तो उस पर ही कदम जमाने की कोशिश कर रहा था। अब ठीक-ठीक पैर जम रहे हैं तो सोचा अपने साथियों से बातचीत हो जाए। यही सोच कर आपके बीच फिर से आ गया हूं। जानता हूं हमेशा की भांति आपका साथ मिलेगा। दो-चार इधर उधर की बातें हो जाएंगी। एक बात और कहना चाहूंगा असल में बात नहीं है एक निवेदन है कि मेरे इस ब्लॉग में कुछ तकनीकी परेशानी आ रही है इस वजह से मैं अपने नए ब्लॉग अपना पंचू पर जा रहा हूं आपसे विनम्र निवेदन है कि जिस तरह आपने मेरा यहां साथ निभाया उसी तरह वहां भी मेरा हौंसला आफजाई करते रहना।
आपका मित्र
लोकेंद्र सिंह राजपूत

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

जिन्दादिली का अहसास है ‘दिल दुखना’


वर्ल्ड हार्ट डे
क्या बात है जी? रोज... डे,.....डे,......डे और आज वर्ल्ड
हार्ट डे। अब आज सारे हृदयरोग याद आएगें। स्वास्थ्य संगठन, लेखक व पत्रकारो को रपट बनाने का मौका मिलेगा। सब अपने-अपने स्तर के आंकडे जुटाएगें कि इतना हजार व्यक्ति इस राज्य में, उतना उस राज्य में और पूरे भारत या विश्व में कुल इतने लाख लोग हृदय रोगों से पीड़ित हैं। खैर अपने को इससे कोई मतलब नहीं। आप सोच रहे होगे कि मैं दिल का मरीज नहीं हूं इसलिए मुझे इससे कोई मतलब नहीं। ऐसा ही सोच रहे हो ना?
इधर कान लाओं, लेकिन पहले वादा करो किसी से कहोगे नहीं, पक्का नहीं कहोगे ना। असल में मुझे भी दिल की बीमारी है। पता है मेरा दिल बहुत दुखता है इसीलिए तो मैंने अपने ब्लाॅग का नाम भी रख लिया दिल दुखता है
यार मैं बहुत परेशान हूं ‘दिल के दर्द’ से। अभी जवानी है खेलने-कूदने के दिन है, कुछ रचनात्मक कार्य करने दिन है पर, दिल है कि मानता नहीं। हमेशा उल्टी दिशा में, गलत जगह ध्यान देता है फिर दुखता है। खुद भी परेशान रहता और सवा पांच फुट के शरीर को भी फोकट में टेंशन देता हैं। अब आप ही बताओ भला इस उम्र में इसे क्या जरूरत है राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंता करने की। धर्म-अधर्म, गरीबी-भूखमरी की। क्या जरूरत है समाज के पचडे में टांग अड़ाने की। देखो जो चल रहा है वो तो चल ही रहा है किसी के उंगली करने से कुछ हो सकता है क्या? अच्छे-अच्छे मर गए, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, सुभाषचन्द्र, महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय इनके सुधारने से भी कुछ हुआ क्या? गांधी ने लाख कहा था ‘सुराज’ पर चलो, ‘स्वदेशी’ बनों, बताओ कहां चल रहे हैं हम?
मुझे पता है आपके दिमाग मे भी यहीं आया होगा कुछ तो नहीं बदला। कोई परिवर्तन तो नहीं आया। तो भाई ये भी गलत है परिवर्तन तो आता ही है। आया है तभी तो हमारा-तुम्हारा दिल दुखता है। अगर उनका दिल न दुखा होता तो हमारे दिल को कहां से दुखने की प्रेरणा मिलती। आपको पता है ‘दिमाग स्वार्थी होता है।’ बनिया हमेशा दिमाग से सोचता है लेकिन दिल के साथ ऐसा नहीं दिल में ही तो ‘दुनिया का दर्द’ पलता है। याद है कहावत ‘ये पत्थर दिल है’। किसी की पीढ़ा देखकर उसकी मदद के लिए आगे नही आने वाले के लिए कही जाती है। दिल ही तो दूसरो के लिए धड़कता है दिमाग सिर्फ अपने लिए। तभी तो ये कहावत नही बनी कि ‘इसका दिमाग पत्थर’ है।
लोग कहते भी है आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक धडकता है’ पर मेरा मानना कुछ अलग है असल में आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक उसकादिल दुखता है। तो भाई जिन्दगी जिंदादिली के साथ जीना है तो दिल को दुखाओ पर याद रखना दिल दूसरो के किए दुखे जिस दिन खुद किया दुखा तो लेने के देने पड़ जाएगें। बस थोडी सी सावधानी के साथ धडकने दो दिल को दुखने दो दिल को। जाते-जाते तुलसीदास जी की बात याद आ गई
परहित सरस धर्म नहीं भाई
पर पीढ़ा सम नहीं अधिमाई’’
तुलसी की इन पंक्तियों का क्या मतलब है सब जानते है और हां तुलसी का दिल जब तक उनकी पत्नि के हाड-मांस के शरीर के लिए दुखा उन्हें कोई नहीं जानता था। लेकिन जब पत्नि की उल्हाना पर जब उनके दिल का दर्द बदला तो विश्व विख्यात बन गए।

रविवार, 20 सितंबर 2009

वांटेड दक्षिण की पोक्किरी

जबलपुर में मुझे दो माह से ऊपर हो गया है... जब भी मन नही लगता पास ही की ज्योति टाकिज में फ़िल्म देखने चला जाता हूँ॥ इस तरह मैंने अब तक कुल जमा ज्योति टाकिज में तीन फिल्में देख ली है। पहली थी 'फॉक्स', दूसरी 'आगे से राईट' , अभी शनिवार को देखी 'वांटेड' । जिंदगी में इससे भी हाउस फुल शो देखे थे... लेकिन टिकिट कैसे ब्लैक होती है ये तो पहली बार ही देखा। ज्योति में अलग-अलग टिकिट के अलग अलग दाम है। १० रु जिसमे आपको ठीक परदे के नीचे वाली सीट पर बैठने का मौका मिलेगा। आप सर उठा कर फ़िल्म देखेंगे। साथ ही हीरो - हीरोइन को खास कर आइटम डांसर को पास से देखने का पुरा मौका। उसके बाद १५ रु, २५ रु, ३५ रु, और ५० रु की टिकटें भी होती है जैसी सुविधा वैसी टिकट। मुझे अच्छा सिस्टम लगा। हाँ तो मैंने पहली बार टिकिट ब्लैक होते देखी - १५ का २५ में। २५ का ५० में। लेकिन हमने तीन टिकिट ले ली विण्डो से 30 वाली

फ़िल्म - वांटेड, निर्देशक - प्रभुदेवा, निर्माता - बोनी कपूर
कलाकार - सलमान खान, आयशा टाकिया, प्रकाश राज , महेश मांजरेकर और अन्य

फ़िल्म की स्टार्टिंग मार-काट से होती है और मार-काट पर ही ख़त्म। फ़िल्म की स्टोरी पुराने स्टाइल की है जिसमे एक पुलिस वाला होता है जो अंडरवर्ल्ड का खत्म करने के लिए एक गुंडे के रूप में उनके गैंग में शामिल होता है... और फ़िर सबको मरना शुरू कर देता है। राधे(सलमान) गुंडे के रूप में ऐसा करता है। अकेले ही बन्दूक धारी गुंडों को चुटकी में मसल देता है... फ़िल्म देख कर ऐसा लगता है जैसे की हम कोई दक्षिण की फ़िल्म देख रहे हो। बाद में पता चला की ये दक्षिण की ब्लाकबस्टर फ़िल्म पोक्किरी का हिन्दी रूपांतरण है। आयशा टाकिया ने मिडिल क्लास की लड़की का रोल प्ले किया है, जिसे राधे से प्यार हो जाता है। वो जानती है की राधे गुंडा है लेकिन लोगो की मदद भी करता है। पर वो सोचती है की उसका प्यार राधे को बदल देगा। कहानी के अंत में पता चलता है राधे पुलिस ऑफिसर है। फ़िल्म में महेश मांजरेकर ने धूर्त पुलिस वाले का रोल बखूबी निभाया है...

कहानी भले ही पुरनी थी लेकिन मनोरंजन को प्रमुखता देने वाले प्रभुदेवा ने कहीं भी कहानी में उबाऊपण नही आने दिया। सलमान हीरो था तो निश्चित बात थी की थोडी बहुत तो फ़िल्म में टपोरी गिरी होगी उस तरह के संवाद भी होने सो थे और फ़िर शर्ट भी उतारी, सलमान ने अपना बदन भी खूब दिखाया .... फ़िल्म ठीक थी, पैसा बसूल। लेकिन मार-काट की अधिकता के चलते मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को शायद न खींच पाए। फिलहाल तो रेस्पोंसे अच्छा है... सिंगल स्क्रीन थियेटर में खूब भीड़ लग रही है... टिकिट ब्लैक भी हो रही है.... वैसे सलमान को एक अदद हित फ़िल्म की जरुरत थी और बोनी कपूर को पैसे बनने थे सो बना लिए। फ़िल्म का संगीत पक्ष बेहद कमजोर है.... कोई भी गाना जुबान पर नही चढा। शुरू के एक गाने में अनिल कपूर, गोविंदा और ख़ुद प्रभू देवा ने डांस किया।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

तालिबानी सोच का शिकार हो रहे है हिंदू, पाकिस्तान में

सारा जगत है सोया हुआ.....
सारे मानवाधिकारी छुपे बैठे है बिलों में.... या फ़िर लगे है अत्याचारियों को बचाने में....
१९४७-४८ में पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या १६% से २०% तक थी। यह मैं नही कह रहा ये पाकिस्तान की जन-गणना के आंकडे बताते है... लेकिन हिन्दुओ पर इन ६३ सालों में पाकिस्तान में इतने जुल्म ढाये गए की उन्हें या तो वहां से भाग कर अपनी जान और अपने परिजनों की जान बचानी पड़ी या फिर मौत को गले लगाना पड़ा... एक और रास्ता चुनना पड़ता था उसे पाकिस्तान के कठमुल्ले जबरन थोपते थे... इस्लाम। हिदुओं को जबरन मुस्लिम बनाया जाता... वहां इन सब जुल्मों के चलते हालात ये हो गयी है की पाकिस्तान में हिन्दुओ की जनसँख्या घटकर १.६% से भी कम रह गयी है.... वहां हिन्दुओं को अपनी सम्पति छोड़ कर भागना पड़ा है... अपनी बहु- बेटिओं की इज्जत खोनी पड़ी है.... पर इस पर दुनिया में तो क्या भारत में भी कोई हल्ला नहीं बोलेगा... हाल के वर्षों में वहां क्या कुछ हुआ है जरा नीचे पढें साथ ही मेरा पुराना लेख कोई तो सुने इनकी पुकार को भी पढ़ें ............
पिछले चार सालों में पाकिस्तान से करीब 5 हजार हिंदू तालिबान के डर कर भारत आ गए, कभी वापस न जाने के लिए। अपना घर, अपना सबकुछ छोड़कर, यहां तक की अपना परिवार तक छोड़कर, आना आसान नहीं है। लेकिन इन लोगों का कहना है कि उनके पास वहां से भागने के अलावा कोई चारा नहीं था। 2006 में पहली बार भारत-पाकिस्तान के बीच थार एक्सप्रेस की शुरुआत की गई थी। हफ्ते में एक बार चलनी वाली यह ट्रेन कराची से चलती है भारत में बाड़मेर के मुनाबाओ बॉर्डर से दाखिल होकर जोधपुर तक जाती है। पहले साल में 392 हिंदू इस ट्रेन के जरिए भारत आए। 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 880 हो गया। पिछले साल कुल 1240 पाकिस्तानी हिंदू भारत जबकि इस साल अगस्त तक एक हजार लोग भारत आए और वापस नहीं गए हैं। वह इस उम्मीद में यहां रह रहे हैं कि शायद उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाए, इसलिए वह लगातार अपने वीजा की अवधि बढ़ा रहे हैं। गौर करने लायक बात यह है कि यह आंकड़े आधिकारिक हैं, जबकि सूत्रों का कहना है कि ऐसे लोगों की संख्या कहीं अधिक है जो पाकिस्तान से यहां आए और स्थानीय लोगों में मिल कर अब स्थानीय निवासी बन कर रह रहे हैं। अधिकारियों का इन विस्थापितों के प्रति नरम व्यवहार है क्योंकि इनमें से ज्यादातर लोग पाकिस्तान में भयावह स्थिति से गुजरे हैं। वह दिल दहला देने वाली कहानियां सुनाते हैं।
इन्हें भी पढ़ें
रेलवे स्टेशन के इमिग्रेशन ऑफिसर हेतुदन चरण का कहना है, 'भारत आने वाले शरणार्थियों की संख्या अचानक बढ़ गई है। हर हफ्ते 15-16 परिवार यहां आ रहे हैं। लेकिन इनमें से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि वह यहां बसने के इरादे से आए हैं। लेकिन आप उनका सामान देखकर आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि वह शायद अब वापस नहीं लौटेंगे।' राना राम पाकिस्तान के पंजाब में स्थित रहीमयार जिले में अपने परिवार के साथ रहता था। अपनी कहानी सुनाते हुए उसने कहा- वह तालिबान के कब्जे में था। उसकी बीवी को तालिबान ने अगवा कर लिया। उसके साथ रेप किया और उसे जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया। इतना ही नहीं, उसकी दोनों बेटियों को भी इस्लाम कबूल करवाया। यहां तक की जान जाने के डर से उसने भी इस्लाम कबूल कर लिया। इसके बाद उसने वहां से भागना ही बेहतर समझा और वह अपनी दोनों बेटियों के साथ भारत भाग आया। उसकी पत्नी का अभी तक कोई अता पता नहीं है। एक और विस्थापित डूंगाराम ने कहा- पिछले दो सालों में हिंदुओं के साथ अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं खासकर परवेज़ मुशर्रफ के जाने के बाद। अब कट्टरपंथी काफी सक्रिय हो गए हैं... हम लोगों को तब स्थायी नौकरी नहीं दी जाती थी, जब तक हम इस्लाम कबूल न कर लें। बाड़मेर और जैसलमेर में शरणार्थियों के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा कहते हैं- भारत में शरणार्थियों के लिए कोई पॉलिसी नहीं है। यही कारण है कि पाकिस्तान से भारी संख्या में लोग भारत आ रहे हैं। सोढ़ा ने कहा- पाकिस्तान के साथ बातचीत में भारत सरकार शायद ही कभी पाकिस्तान में हिदुंओं के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार व अत्याचार का मुद्दा नहीं उठाती है। उन्होंने कहा- 2004-05 में 135 शरणार्थी परिवारों को भारत की नागरिकता दी गई, लेकिन बाकी लोग अभी भी अवैध तरीके से यहां रह रहे हैं। यहां पुलिस इन लोगों पर अत्याचार करती है। उन्होंने कहा- पाकिस्तान के मीरपुर खास शहर में दिसंबर 2008 में करीब 200 हिदुओं को इस्लाम धर्म कबूल करवाया गया। बहुत से लोग ऐसे हैं जो हिंदू धर्म नहीं छोड़ना चाहते लेकिन वहां उनके लिए सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

तू चीन रख ले मुझे पाकिस्तान देदे यार...



शीर्षक पड़ कर आप चौक गए होंगे है न .... चौकना भी लाज़मी है अब तक लोग भारत के हिस्सों की ही मांग कर रहे थे॥ ये कौन आ गए जो धूर्त चीन और कपटी पकिस्तान को ही मांगे जा रहे है... है भाई कुछ लोग है जो रोज ऐसा करते है, पर उसके पीछे चीनी मानसिकता और पाकिस्तानी सोच नही होती। जब भी आपको मौका मिले तो शाम के वक्त ठीक ठीक वक्त बताऊँ तो ९ बजे.... हाँ ठीक ९ बजे के आस पास किसी भी अखबार के दफ्तर में आप चले आईये। पेज लगते वक्त बातचीत का जो दौर बेहद रोचक होता है। लेकिन सिर्फ़ शान्ति से बैठकर सुनने वाले के लिए वहां काम करने वाले पत्रकार के लिए तो वो समय युद्घ के मैदान की तरह होता है... क्योकि उस वक्त उसका पूरा ध्यान काम पर होता है उसे डेडलाइन से पहले अपनी जिमेदारी पूरी करने होती है तो उसका ध्यान तो इस तरह की मजेदार बातचीत पर कम ही जा पता है... हाँ किसी को मजे लेने हो तो वो उस वक्त वहां पहुँच कर खूब मजे ले सकता है... भागती जिंदगी के बीच कुछ क्षण हंस सकता है... उन पलों में किस तरह की बातचीत होती है उसके कुछ नमूने देखिये.......

१- अरे यार पूरा पाकिस्तान तू लेगा क्या कुछ मुझे भी दे दे। अच्छा एक काम कर तू मुझे चीन और श्रीलंका ही देदे । (कुछ मेरे पेज पर भी जाने दे भाई...)

२- मनकू जी जरा १३ (पेज नंबर) से अफगानिस्तान को ८ पर पटक दे...
3- भाई ये सोनिया और मनमोहन को एक ही बॉक्स में लगा दे॥ फिर ठीक लगेगा।
४- और हाँ सुन... ये बाबा और सेलिना जेटली को सिंगल सिंगल लेकिन पास पास मत लगाना..
५- उर्जा मंत्री ज्यादा फ़ैल रहा है... इसे नीचे से काट के साइड में लगा न यार....
६- क्या कर रहा है तू भी न... राहुल बाबा को कहाँ गुसेड दिया जरा उसे फ्रंट पर ला...
७- जल्दी कर भाई राजधानी में ही लटका रहेगा क्या? राजधानी जल्दी से छोड़ कर बालाघाट को पकड़... बालाघाट को निपटा कर जरा ग्वालियर को भी देख लेना......

८- उसको फोन लगा के पूछो अभी तक सतना क्यों नहीं आया....
इस तरह की बातो में फ्री बैठ कर सुनने वाले को बड़ा आनद आता है... मैं भी रोज सुनता रहा पर कभी ध्यान नहीं गया... मेरा ध्यान भी उस दिन गया जब मैं निठल्ला बैठा.... उस दिन ही मैंने सोचा क्यों न इस मजेदार तथ्य से अपने मित्रो को परिचय करों... अगर समय हो तो कभी सुनना..... फिर महसूस करना.... डेस्क पर बैठे बैठे ही देश-विदेश की उठापटक हो जाती है... सारे नेताओ की खींचातानी भी..... जिसको काटना पीटना होता है... बड़ा छोटा करना होता है उसे भी बड़ा छोटा कर देते है.... ये तो कुछ एक नमूने थे घटते तो इससे भी अधिक रोचक है....

शनिवार, 1 अगस्त 2009

नहीं होता मुसलमानों के साथ भेदभाव

मुंबई की एक सोसायटी में मुसलमान होने के कारण मकान न मिलने का आरोप लगाने के बाद इमरान हाशमी अलग-थलग पड़ गए हैं। सिल्वर स्क्रीन के सीरियल किसर इमरान हाशमी को मुंबई में सोसाइटी में घर नहीं मिल रहा है। इमरान का आरोप है कि वह मुस्लिम हैं इस नाते उन्हें सोसाइटी में कोई घर बेचने को तैयार नहीं है। लेकिन इसके पीछे इमरान हाशमी जो वजह बता रहे हैं वह बेहद गंभीर है। इमरान हाशमी जब पाली हिल के नजदीक निबाना कोऑपरेटिव सोसाइटी में घर की तलाश में पहुंचे तो वहां के पदाधिकारियों ने कहा कि आप कहीं और देख लें। इमरान मानते हैं कि सोसाइटी उन्हें घर बेचने के लिए सिर्फ इसलिए राजी नहीं है क्योंकि वह मुस्लिम हैं। लेकिन इंडस्ट्री के ही अन्य मुस्लिम कलाकार उन्हें गलत ठहरा रहे हैं। सलमान खान, आमिर खान और रजा मुराद के बाद शाहरुख खान ने भी धर्म के आधार पर किसी भेदभाव से इनकार किया है। एक कार्यक्रम के सिलसिले में शनिवार को दिल्ली आए शाहरुख खान पहले तो इस मुद्दे पर जवाब देने से बचते रहे, लेकिन बार-बार यह सवाल उठने पर उन्होंने कहा, 'मैं धर्मनिरपेक्षता का जीता-जागता उदाहरण हूं। मेरे माता-पिता मुस्लिम थे और पत्नी हिंदू हैं। दूसरे धर्म में शादी करने के बावजूद मुझ पर कभी उंगली नहीं उठाई गई। मेरे धर्म गुरुओं ने मुझे कभी नहीं बताया कि ऐसा करने पर मुस्लिम धर्म में मेरी क्या जगह है? यह मुद्दा मुझे कभी परेशान नहीं करता। चाहे दिल्ली में बिताया गया वक्त हो या इंडस्ट्री में गुजारे 20 साल, मैंने धर्म के कारण भेदभाव कभी नहीं झेला।'
शाहरुख़ खान का मानना है कि अगर कहीं ऐसी इक्का-दुक्का घटना होती भी है, तो उसे मीडिया में तूल नहीं देना चाहिए। इससे अन्य देशों में भारत की छवि खराब होती है और वे भारत को बंटा हुआ देखते हैं, जबकि हकीकत इसके उलट है।

बुधवार, 17 जून 2009

शायनी आहूजा की फ़िल्म न देखे.......


रविवार की रात ही की बात है। मैं हिन्दी फ़िल्म 'करम' देख रहा था। उसमें शायनी आहूजा का अभिनय देख कर काफी प्रभावित हुआ। हांलाकि मैंने इससे पहले भी शायनी की अन्य फिल्में भी देखी थी। सभी फिल्मों में उसने बड़ी ही संजीदा भूमिका निभाई थी। मैं बोलीवुड के जिन कलाकारों को अधिक पसंद करता हूँ उनमे शायनी आहूजा का नाम भी शामिल था ( अब नही )। हाँ तो बात रविवार की है.... इधर में उसकी फ़िल्म में खोया हुआ था उधर वो अपने घ्रणित कार्य के कारन पुलिस हिरासत में... जहाँ एक ओर वह फ़िल्म करम में एक ईमानदार और कर्मठ पुलिस वाले की भुमिका निभा रहा था वहीँ दूसरी ओर वो अपनी चिरकुट हरकत के लिए पुलिस हिरासत में अपराधी की भूमिका में था।
मैंने
रात में ही न्यूज़ चैनल पर यह ख़बर देखी तो दिल को बड़ा आघात लगा। मेरे मन आया कि मैं इस दुष्ट की फ़िल्म क्यो देख रहा था... मैंने उसी पल तय किया अब भविष्य में कभी भी इस टुच्चे की फ़िल्म नही देखूंगा। क्योकि मैंने समाचार में सुना की इसने अपनी नौकरानी के साथ दुष्कर्म किया है। इसकी शिकायत
नौकरानी ने अंधेरी (प.) स्थित ओशिवारा पुलिस स्टेशन में दर्ज करायी है। नौकरानी का आरोप है कि रविवार दोपहर 3 से 5 बजे के बीच आहूजा ने अपनी पत्नी की गैर मौजूदगी में उसके साथ दुष्कर्म किया। शायनी आहूजा ने रात में ही अपना जुर्म कबूल कर लिया है। सुबह होश में आने पर उसने कहा की वो सब तो नौकरानी की रजामंदी से हुआ था। भगवन ही जनता कि है रजामंदी से हुआ या नही। पर जो भी आहूजा ने किया वो तो ग़लत था न। अगर नौकरानी की रजामंदी से हुआ है तो फ़िर उसने शिकायत क्यों की? यह प्रश्न उठता है। और रात में आहूजा ने अपना जुर्म क्यो स्वीकार किया? यह प्रश्न भी सामने आता है. मेरा मानना है की आहूजा ने न सिर्फ़ अपनी नौकरानी का मान मर्दन किया है बल्कि अपनी पत्नी को धोखा दिया है, उसके साथ विश्वाश्घात किया है। हिन्दी फ़िल्म जगत में अक्सर ऐसा ही होता है। पता नही इन लोगों को समाज की मर्यादाओं को तोड़ने में और दुष्कर्म करने में कितना मजा आता है... ठीक है आप खूब करो उल्टे सीधे कर्म करो। पर कम से कम लोगो के नायक मत बनो। असल और फिल्मी जिन्दगी में भी जैसा जीते हो, अपने लिए वैसी ही भूमिका का चयन करें। मेरी लोगो से अपील है की ऐसे किसी भी हीरो की फ़िल्म न देखे.......

शुक्रवार, 12 जून 2009

नस्लीय हिंसा पर प्रताप ने की थी सिंह गर्जना

‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है, और मृतक समान है।।’’
ये पंक्तियाँ प्रसिद्ध ऐतिहासिक समाचार पत्र ‘प्रताप’ की ध्येय वाक्य थीं। ये पंक्तियाँ योद्धा पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी के निवेदन पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखीं थी। इन पंक्तियों से ही पता चलता है कि प्रताप कैसा अखबार रहा। प्रताप एक राष्ट्र प्रहरी की भूमिका में था। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लीय हिंसा के विरोध में इतना कठोर आज के किसी भी अखबार ने नहीं लिखा जितने 1913 में दक्षिण अफ्रीका नस्लीय हिंसा का शिकार हो रहे भारतीयों की दुर्दशा को देखकर प्रताप में विद्यार्थी जी ने लिखा था।
अपने दूसरे ही अंक ‘‘प्रताप’’ के खुल तेवर के साथ, सिंह सी तरह गर्जना करके लिखा। 16 नवम्बर 1913 के सम्पादकीय अंगलेख ‘‘निरंकुशता’’ मे विद्यार्थी जी लिखते हैं- ‘‘इस समय दक्षिण अफ्रीका में डेढ़ लाख हिन्दुस्तानी हैं। इनमें पांचवा हिस्सा ऐसे हिन्दुस्तानी का है, जो कुली बनकर नहीं, बल्कि वैसे ही वहां जा बसे। हमारे देश भाइयों ने खूब परिश्रम किया और उससे वे फले-फूले। गोरों की आंखों में उनकी उन्नति बेतरह खटकी। गत शताब्दी के पिछले हिस्से में वे इस बात की सिर तोड़ कोशिश करने लगे कि किसी तरह भी हो, न्याय से या अन्याय से, इन कालों को इस भूमि से निकाल बाहर करना चाहिए।’’
भारत सरकार की चुप्पी पर ‘‘प्रताप’’ ने सवाल उठाया- ‘‘हमारे देश भाई तो अफ्रीका में रहते- सहते और टैक्स देते हुए भी वहां वोट तक देने का अधिकार न पावें और वहां के निवासी आकर हमारी सिविल सर्विस में ऊंचे-ऊंचे पद पावें। इस उदारता का भी कहीं ठिकाना है ?’’ ( भारत में आज भी यह स्थिति हैं कि भारत के बाहर के लोग इस देश में इस देश की संतति से अधिक सुविधा प्राप्त हैं। चाहे वो अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए क्यों न हों? )
‘‘प्रताप’’ के अगले ही अंक (22 नवम्बर 1913) में विद्यार्थी जी का धैर्य मानों जवाब दे गया। वे हुंकार भरते हैं- ‘‘देश में दक्षिण अफ्रीका के उस कोयले की जरूरत नहीं, जिस पर हमें अपने भाइयों के खून के छींटे नजर आवें। हमारे देष का रुपया उन नर पिशाचों की जेबों में न जाए, जो हमारे भाइयों का गला इस बेदर्दी के साथ घोंट रहे हैं।’’
अपने भारतीयों के दर्द पर ऐसी हुंकार भरी थी उस समय के साप्ताहिक समाचार पत्र ने। प्रताप ने दक्षिण अफ्रीका में हो रहे भारतीयों के साथ नस्लीय भेद पर तक तक तीखा प्रहार जारी रखा जब तक कि भारत सरकार पर दबाव न बन गया।
आॅस्ट्रेलिया शुद्ध चोर - लुटेरों का देश है। मेरा एक दोस्त विभिन्न देशों के बारें में अध्ययन कर रहा था तब उसने मुझे बताया था कि आॅस्ट्रेलिया अपराधियों ने बसाया था। विभिन्न युरोपिय देशों के शातिर बदमाश, जो लूट, चोरी, हत्या आदि अपराधों के आरोपी थे वो लोग अपने अपने देश की पुलिस के डर से वहाँ से भाग - भाग कर आॅस्ट्रेलिया में आकर बस गये। अब ऐसे लोगों की संतानों में उनका दुर्गुण होना स्वभाविक ही है। भारत सरकार और अंतराष्ट्रीय हितों की पैरोकार संस्थाओं को जल्द ही आॅस्ट्रेलियाई सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।

मंगलवार, 2 जून 2009

बंद से क्या असर होता है ?

बंद से क्या असर होता है ? बहुतों को नहीं पता, पर उन्हें जरूर पता है जिनके घर का चूल्हा बंद वाले दिन नहीं जलता। कल कांग्रेस ने हत्या के विरोध में ग्वालियर बंद करवाया। इस दौरान मेरी कुछ ऐसे लोगों से चर्चा हुई जो रोज कमाते हैं और रोज खाते हैं। उन्हे रोज रोज के बंद और हड़ताल के कारण कई कई दिन मजबूरी में उपवास रखना पड़ता है। उनका कहना था - साहब हम तो भूखे रह भी ले पर हमसे अपने बच्चों का भूखा रहना नहीं देखा जाता। हमें तो कोई किराने वाला एक दिन उधार आटा-दाल भी नहीं देता। सोचता है कि पता नहीं कैसे चुकायेगा और कितने दिन में चुकायेगा।
वाकई कोई इनके बारे में तो सोचता ही नहीं। बंद करने वालों को बंद करना है, हड़ताल वालों को हड़ताल। सभी जानते हैं कुछ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए ये सब करते हैं तो कुछ बेचारे व्यवस्थाओं से परेषान हो कर, आक्रोषित होकर ऐसा करते हैं। राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों से तो कहें क्या? उन्हे तो गरीब जनता से वैसे भी कोई लेना देना नहीं हैं। लेकिन उन से तो थोड़ी सी अपेक्षा रहती है जो व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए, प्रषासन पर दबाब बनाने के लिए यह सब करते हैं। पर कोई इस ओर ध्यान ही नहीं दे पाता कि बंद के दौरान कितने लोग अपने और अपने बच्चों के पेट की आग पानी से बुझायेंगें, कैसे वो छोटे-छोटे बच्चों को बहलायेंगें, भूखे पेट उन्हें कैसे सुलायेगें ? कल उस मजदूर के चेहरे पर परेषानी के भाव अगर ये हड़ताली देख लेते तो शायद फिर कभी हड़ताल न करते। उस मजदूर के सामने यही समस्या थी कि कैसे वो खाली हाथ जाये। घर पर वो कैसे अपनी पत्नी को समझायेगा, चलो पत्नी तो समझ भी जायेगी। बच्चों को क्या कह कर समझायेगा। उसका मन यह सब सोच कर परेशान हो रहा था।
ग्वालियर बंद के दौरान -
हत्या के बंद के दौरान एनएसयूआई का गुस्सा कई लोगों पर उतरा। जिनका न तो कोई संबंध इस हत्या से था और नगर प्रशासन से। वे तो खुद नगर में फैली अव्यवस्था से
परेशान थे। बंद के दौरान एनएसयूआई के कार्यकर्त्ता फूलबाग पर खड़े पौहा के ठेले पर लाठी - डण्डे के साथ टूट पड़े। उसका सारा पौहा खराब कर दिया। एक आॅटो में वृद्ध महिला व बच्चे सवार थे इन हुडदंगियों को यह भी रास नहीं आया। उन्होने आॅटो को रोका उसके कांच फोड़ दिये और उस वृद्ध महिला और बच्चों को भरी दोपहर में पैदल भगा दिया। एजी आॅफिस के सामने एक यात्री बस को रोककर तोड़फोड़ की।
मै अक्सर यही सोचता हूँ इस तरह के बंद का क्या मतलब है? आप किसी परेषानी की वजह से बंद का आवाहान कर रहे हैं अच्छी बात है। पर इतना नहीं समझ में आता क्या आप बंद के दौरान जो जो करते हैं उससे किसी को तकलीफ नहीं होती क्या ? कुछ अपराधी जो छुप - छुप कर कर रहे थे वह सब आप बंद के नाम पर खुले आम कर रहे हैं। बंद करो, प्रशासन पर दबाव बनाओ पर गरीब जनता को तो तकलीफ न पहुंचाओ।

शनिवार, 30 मई 2009

मैं अपने सभी मित्रों के क्षमा चाहता हूँ

मैं अपने सभी मित्रों के क्षमा चाहता हूँबहुत दिन से अपने ब्लॉग पर भी कुछ नही लिखा और ही दोस्तों केविचारों से अवगत हो पाया हूँ... कुछ दिन से पारिवारिक कार्यों और पढ़ाई में इतना उलझा हुआ हूँ की किसी कोसमय नही दे पाया... पर मैं एकाध दिन में ही आपसे रूबरू होता हूँ.... आशा है आप पहले सा ही स्वागत करेंगे....
आपका अपना
लोकेन्द्र

रविवार, 10 मई 2009

माँ क्या होती है ? उससे बेहतर कोई नहीं जानता


माँ क्या होती है ? उसके न होने का दर्द क्या होता है ? शायद यह उससे बेहतर कोई नहीं जानता जिसकी माँ अब उसके साथ न हो। मैंने 25 वर्ष की अपनी उम्र में बहुत कुछ देखा पर किसी की आँखों में माँ के लिए इतनी पीढ़ा कभी नहीं देखी जितनी उसकी आँखों में देखी। उसे जब भी माँ की याद आती है उसकी आँखे भीगे बिना नहीं मानती। आज से ठीक 21 महीने पहले मैंने उसकी आँखों में माँ के लिए प्यार और माँ के न होने की सूनापन देखा था। भरी क्लास में उसकी आँखों से झरते आंसू देख कर मैं अंदर ही अन्दर व्याकुल हो गया फिर सोचा कि चलो इससे बात की जाए। पर मन ही मन डर लग रहा था पता नहीं वो क्या सोचेगी ? वो बहुत सुन्दर है। अक्सर लड़के उससे गलत नियत से दोस्ती करना चाहते हैं तो मैं सोच रहा था कहीं वह मुझे उन लड़कों के जैसा समझ कर बात करने से इंकार न कर दे। करने चले थे कुछ हो गया कुछ सो मैंने बात नहीं की। फिर धीमें - धीमें हम दोनों मैं बात होना शुरू हुई और दोस्ती गहरी हो गई उसने अपने जीवन के बारे मैं बहुत कुछ बताना शुरू किया। तब उसने बताया कि उसकी माँ की मृत्यु कैंसर के कारण हो गयी तब से वो बहुत अकेली पड गयी है। वो जब भी अपनी माँ को याद करती है उसकी आँखो से माँ के लिए असीम प्यार उमडता है, उसके साथ रह कर मैंने जाना किसी लड़की के लिए माँ के क्या मायने हैं। उसने कहा कि आज मैं अपनी माँ के बिना बहुत अकेलापन महसूस करती हूँ। आज भी होली, दीपावली या कोई भी त्यौहार हो उसे उसकी माँ उसकी आंखो मैं आ ही जाती है। एक दिन मैंने उसको समझाया - कि जिस तरह तुम अपनी माँ को याद करती हो और रोती हो तो कभी सोचा है कि तुम्हारी माँ तुम्हें इस तरह रोते देख उस पर क्या बीतती होगी ? जरा सोचो वो अपनी प्यारी बेटी को रोते देखती होगी तो उसे कितना दुख होता होगा। तुम अपनी माँ को खूब याद करो। पर किस तरह ? ये तुम सोच लो या तो उसको दुख पहुंचा कर याद कर लो या फिर उसे इस तरह याद करो कि जब वो ऊपर से तुम्हें देखे तो निश्चिंत हो कर ठंडी आह् भरे। ऐसे काम करो कि उसे तुम पर गर्व हो जाए और वो स्वर्ग में बडे ही ठसक से बोले - देखो वो मेरी बेटी है। और फिर तुम्हें यूं कभी माँ की गोदी में सोने की इच्छा हो तो मेरी माँ के पास आ कर देखना वो भी तुम्हे उसी तरह प्यार देगी। मुझे भी उसकी गोद में और उसके आँचल में सुरक्षित होने का अहसास मिलता है। मैं उसे समझा रहा था क्योंकि मैं उसे रोते नहीं देखना चाहता था, उसे क्या मैं किसी को भी रोते नहीं देख सकता। लेकिन मेरे समझाने से या कुछ सहारा देने से क्या होता ? मैं उसकी माँ की कमीं को तो पूरा नहीं कर सकता था न। मैं क्या कोई भी उसकी माँ की कमी को पूरा नहीं कर सकता। आज मदर्स डे है और वो मेरे साथ नहीं है मैं अकेला अपने कमरे मैं इंटरनेट के सामने बैठा हूँ , सोच रहा हूँ आज वो अपनी माँ को कितना याद कर रही होगी। कहीं वो अकेले किसी कोने मैं बैठ कर रो तो नहीं रही होगी। नहीं नहीं वो अब नहीं रो सकती, मैंने उसको रोने से मना किया है। पर आज कैसे वो अपने आंसू रोक पाएगी। मुझे पता है वो आज नहीं मानेगी जी भर कर अपनी माँ को याद करेगी और उस प्यारी माँ की यादों से अपनी पलकें भिगोयेगी।
मेरा एक दोस्त और है जिसके पास भी माँ का साथ नहीं हैं उसकी की आंखो में भी मैंने अक्सर वही खालीपन देखा जो उसकी आंखों में देखता हूँ। जिस दिन मेरे इस दोस्त ने मुझसे अपना ये दर्द बाँटा तो कसम खा कर कह रहा हूँ, उसकी आंखों में शायद जितने आंसू नहीं होंगे जितने मेरी आंखो में थे, बस फर्क इतना था कि उसके आंसू दिख रहे थे और मेरे अंदर ही अंदर वह रहे थे। क्या करूं दोस्तों को हँसाने के लिए मैंने रोना छोड़ दिया है अगर मैं भी रो दूँ तो फिर सोचता हूँ संभालेगा कौन ? इसलिए मैं रोता हूँ सब से छिप कर रात के अंधेरे में जब मेरी परछाई भी नहीं देख पाती कि मैं रो रहा हूँ।
हे भगवान किसी को भले ही कुछ मत देना पर किसी को माँ के स्नेही आँचल से वंचित मत करना। उसकी असीम ममतामयी प्यार, दुलार, डाँट, सीख और उसका से किसी को महरूम न रखना। हे भगवान तुझे तेरी माँ का वास्ता है।

मदर'स डे

माँ आखिर माँ होती है .... उससे बढ़कर शायद इस दुनिया में कोई भी नही। एक मूक प्राणी के जीवन का पोषण भीमाँ के हाथों में ही होता है। इस कुतिया को ही देख लीजिये ख़ुद कितनी कमजोर शरीर की है लेकिन फ़िर भी अपनेबच्चो को बहुत ही प्रेम के साथ दूध पिला रही है... माँ के इस प्यार ने बरबस ही मुझे अपनी और खींच लिया था... जिसे में अपने मोबाइल के कैमरे में कैद किया बिना नही रह पाया था।

शुक्रवार, 8 मई 2009

कोई तो सुने इनकी पुकार

पाकिस्तान में हो रहा है हिंदुओं पर अत्याचार

पाकिस्तान में रह रहे सिख बंधु बहुत व्याकुल हैं। व्यथित हैं। सो रहें होंगं कभी तो कोई हमारे लिए आवाज उठाएगा। मेरे अपने हिन्दु भाई मेरे लिए हुंकार भरेंगे । कोई सामाजिक - राजनीतिक - धार्मिक संगठन मदद के लिए हाथ बढ़ाएगा। क्योंकि अब तक ऐसा ही होता आया है। अब जब पाक में रह रहे सिखों का जीने के लिए जजिया चुकना पड़ रहा है तो स्वभाविक है उनके मन में इस तरह के ख्यालात आना। पाक में उनकी हालत बहुत दयनीय है जिंदा रहने के लिए उन्हें मुस्लिम संगठनों को लाइफ टेक्स (करोड़ों में) चुकाना पड़ता है इसके बाबजूद भी देश विभाजन के बाद से लगातार पाक में रह रहे हिन्दुओं की संख्या लगातार घट रही है। (आश्चर्य - संख्या वृद्धि के जगह घट रही है। कारण हिन्दुओं पर अत्याचार) पाकिस्तान में हिन्दुओं पर मुस्लिम संगठनों का इतना दबाब रहता है कि उन्हें कुछ भी, कैसे भी करके जजिया चुकाना पड़ता है वरना मुस्लिम अत्याचारी उनकी लड़कियों को उठा ले जाते हैं, मकान - दुकान तोड़ देते हैं, बलात् धर्म परिवर्तित कर देते है यह क्रूर सत्य है।
पर दुर्भाग्य है पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं का जो उनके लिए कोई नारे बुलंद नहीं करता। धर्म निरपेक्षता की बात करने वाले कम्यूनिष्ठ ( कम्यूनिष्ठ - भारत के प्रति कम निष्ठावान), हिन्दुत्व की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी ध्यान नहीं देती। कांग्रेस की तो बात ही क्या करें उनके घुटने भी वामपंिथयों की तरह हमेशा मुस्लिम हितों की ओर झुकते हैं। कुछ एक अपराधी प्रवुति के मुस्लिम गुजरात में संर्दिग्ध परिस्थितियों में मारे गए उनके लिए तो सब हो हल्ला मचाते है इन पर हो रहे अत्याचार किसी को नहीं दिख रहे। कांग्रेस के नेता और भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने आस्ट्रेलिया में आंतकवादी गतिविधियों के संदेह में गिरफ्तार मोहम्मद हनीफ की गिरफ्तारी पर कहा था - मुझे रात भर नींद नहीं आई। उन्हीं प्रधानमंत्री को सैंकड़ो मील दूर आंतकवादी गतिविधियो में लिप्त हनीफ की गिरफ्तारी पर नींद नहीं आई वहीं आंख के सामने पाकिस्तान में सिखों पर हो रहे अत्याचार पर आंख, कान और मुँह सब बंद कर रखे है। वे तथाकथित धर्मनिरपेक्षी हिन्दू भी आवाज नहीं उठा रहे जिन्हें अल्पसंख्यकों की बढ़ी चिंता रहती है पाक में सिख की अल्पसंख्यक है जरा ध्यान दो। इस्लाम की सही शिक्षा और सही रूप प्रस्तुत करने वाले
पाक-साफ मुस्लिम संगठन भी खामोश है। जबकि जजिया लेने वाले चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं हम जो कर रहे हैं कुरान शरीफ के हिसाब से कर रहें हैं। ये लोग भी तभी घर से निकलते हैं जब इनके लोगों का नाम आंतकवादी गतिविधियों में फंसता है। तब सब अपने को पाक-साफ साबित करने के आगे आते है। इनके लोगों द्वारा किए जा रहे कामों का ये कभी विरोध करने के लिए एक साथ नहीं खड़े होते।
आपको लग रहा होगा मैं मुस्लिम विरोधी मानसिकता से लिख रहा हूँ पर सत्य यह है कि मैं चाहता हूँ सब बिना भय के साथ-साथ रहें। पर उसके लिए एक-दूसरे के लिए आगे आना पड़ता है भारत में एक समय बगदाद के खलीफा के अधिकार छीने जाने पर महात्मा गांधी ने हिन्दु-मुस्लिम सबके साथ मिलकर आंदोलन चलाया था। तो क्या हम पाकिस्तान में सिखों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करें।
सर्वे भवन्तु सुखिना...........
यही मेरी और मेरे पूर्वजों की सोच है।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

मतदान अवश्य करें


30 अप्रैल को मैं करूंगा अपने मत का प्रयोग आप भी करना। वोट का प्रयोग करना जरूरी है। अगर आप वोट नहीं डालते तो आपको नेताओं पर और राजनीति पर ऊंगली उठाने का कोई अधिकार नहीं है। राजनीति में अगर गंदगी है तो उसे साफ करने के लिए आगे आईये। मत डालिए अगर सकारात्मक नहीं डाल सकते तो फार्म 17 अ के तहत नकारात्मक मत डालिए पर डालिए जरूर।
वोट डालने से पहले विचार करें -
- चुनाव मैदान में खड़े अनेक प्रत्याशियों में से आपको एक का चुनाव करना है। प्रत्याशी, दल और उसका सिद्धांत इन पर विचार करना पड़ता हैं कोई बुरा प्रत्याशी केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छे दल की ओर से खड़ा है। बुरा बुरा ही होता है और दुष्ट वायु की कहावत की भाँति वह कहीं भी और किसी का भी हित नहीं कर सकता। दल के हाईकमान ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा या वह निर्णय में भूल कर गया होगा। अतः ऐसी गलती को सुधारना उत्तरदायी मतदाता का कर्तव्य है। इसलिए भी हमें शत-प्रतिशत मतदान के लिए जनता को जागरूक करना
- मतदाता को उद्देश्य पर विचार करना चाहिए, जाति पर नहीं। जाती को हावी न होने दंे। डाॅ. मनोहर लोहिया तक को केवल इसलिए प्रत्याशी बनने से वंचित रह जाना पड़ा क्योंकि वे उस जाति के नहीं थे, जिसके सदस्यों की उस निर्वाचन क्षेत्र में बहुत अधिक संख्या थी। घटना उत्तर प्रदेश के एक उपचुनाव के समय घटित हुई थी।
- संभावित विजेता का साथ न देकर योग्य प्रत्याशी का साथ देना चाहिए। पहले सही मनुष्य का चुनाव करें और तब यह प्रयत्न करें कि आपका चुना हुआ प्रत्याशी विजयी हो। वह ही आपकी विजय होगी।- आप दुनिया को बता दे कि आपका मत बिकाऊ नहीं है।
- जब आपको मतदान करना हो तो आप अंतिम क्षण तक असमंजस की स्थिति में न रहें। पहले ही सोच विचार लें कि किसे वोट करना है।- मतदान का अधिकार सामाजिक उपयोग के लिए व्यक्तिगत अधिकार है वह आपकी स्वतंत्रता का द्योतक है। आप किसी के आदेश या याचना पर मतदान न करंे। अंत मैं एक ही आग्रह करूंगा कि मतदान अवश्य करंे। अपने स्वाभिमान के लिए, आंतकवाद के खिलाफ, मंहगाई के खिलाफ, अशिक्षा, असुरक्षा, असुविधा के खिलाफ।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

पश्चिम की नकल से अपनी तहजीब भूले भारतीय

भारत देश अपने आप में बहुत खास देश है। यहाँ की संस्कृति के चर्चे विश्व में किए जाते हैं, लेकिन आज यहाँ के हालात ऐसे हो चले हैं कि लोग पश्चिमी संस्कृति को ग्रहण कर रहे हैं और अपनी तहजीब को भूलते जा रहे हैं। हम जब भी यहाँ आते हैं और इस तरह से यहाँ की संस्कृति को विकृत होते हुए देखते हैं तो बड़ा बुरा-सा लगता है। यह बात न्यूयार्क निवासी कृष्ण कुमार गुप्ता और उनकी पत्नी श्रीमती सुधा गुप्ता ने नई दुनिया के पत्रकार से चर्चा के दौरान कही। उन्होंने कहा मुझे बड़ा दुख होता है कि दुनिया भारत की संस्कृति की ओर दीवानों की तरह देख रही है और हमारे लोग दूसरों की विकृत संस्कृति के पीछे आंख बंद करके दौड़ रहे हैं। कृष्ण कुमार जी मूलतः ग्वालियर के रहने वाले हैं, यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है। काम के सिलसिले में वे सन् 1981 में अमेरिका चले गये थे तब से वहीं रह रहे हैं। श्री गुप्ता ने बताया कि जिस तरह यहाँ की पीढ़ी भारतीय संस्कारों, परंपराओं से दूर हो रही है, अपनी संस्कृति में कमियाँ दिखा रही है वहीं न्यूयार्क में रहने वाले भारतीय आज भी भारतीय रहन-सहन (भारतीय कल्चर) ही पसंद करते हैं। उनके साथ आई उनकी पत्नी श्रीमती सुधा गुप्ता ने भी इस बात पर खेद प्रकट किया कि हम लोग अपने ही देश में अपने संस्कृति को खोते जा रहे हैं जबकि दुनिया भर में इसकी चर्चा है। जहाँ यहाँ की लड़कियों के बाद अब विवाहित महिलायें जींस पहनना चाहती हैं वहीं वहाँ की महिलायें भारतीय परिधान पहनना ही पसंद कर रहीं है और अपने बच्चो को भी भारतीय संस्कारों से शिक्षित कर रही हैं। उन्होनं कहा कि हमने अपने बच्चों को सिर्फ कर्म का धर्म ही सिखाया हैं यदि उनसे पूछा जाये कि तुम्हारा धर्म कौन-सा है तो वे कर्म को ही अपना धर्म बतायेगंे। भगवत गीता में भी यही लिखा है।
हमें लज्जा आनी चाहिए कि किस तरह दुनिया हमसे सीखना चाहती है और हम दुनिया को सिखाने की जगह भोग-विलास में डूबते जा रहे हैं। जिस संस्कृति (पश्चिमी संस्कृति) से वहाँ के लोग भाग रहे हैं हम उसे दीवानों की तरह अपनाते जा रहे हैं। उसके तमाम दुष्परिणाम हमें देखने को मिल रहे हैं। पश्चिमी संस्कृति के अवगुणों को देख कर ही संभवतः स्वामी दयानंद सरस्वती ने लोगो से कहा था - वेदों की ओर लौटो। हमें अपने आपको बचाना है और संस्कारों को जीवित रखना है तो अपनी जड़ो की ओर लौटना होगा। हम जिस आजादी, बोल्ड माइंड और खुलेपन की बात करते हैं उसी वातावरण में 28 वर्षों से रहने के बावजूद श्री गुप्ता और उनका परिवार आज भी भारतीय संस्कारो को अपनाते हैं बल्कि अपनाते ही नहीं जीते हैं। यही है भारतीयता का जादू। अभी भी समय है जाग जाओ, तन्द्रा तोड़ो, मत किसी के पीछे भागो। खुद को पहचानो। तुम औरों की नकल क्यों करते हो जबकि और आपकी नकल करना चाहते है खैर वैसे आप खुद समझदार हैं मैंने तो बस अपनी और श्री गुप्ता जी की बात से आपको अवगत कराने का प्रयास किया है बाकी आपकी समझ।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मेरे गांव का मेला, बडा रंगीला


मंदिर परिसर के अन्दर का द्रश्य और मेले में उमड़ी भीड़ की झलक


मेरे गांव के आस-पास के इलाके में तीन-चार मेले लगते हैं। सभी चैत्र में ही लगते हैं। नवदुर्गा में शक्ति उपासना के बाद अष्टमी, नौमी के दिन ये मेले लगते हैं सभी मेले किसी देवी माँ के आंगन में ही लगते हैं। मेरा दोस्त भी मेरे साथ आज मेला देखने गया था। वह एकाएक मुझसे पूछता है कि भाई आज गर्मी बहुत हो रही है गांव वाले इस मेले का आयोजन सर्दियों में क्यों नहीं करते। तब मैंने उसे बताया- भाई इस मेले में हजारों लोगों की जो भीड़ दिख रही है वे सब इस धरती माँ के लाडले बेटे हैं जो उसके आंचल में फसल उगाते हैं और सब के पेट भरने की व्यवस्था करते हैं। ये सभी लाड़ले बेटे इसी समय फुरसत में होते हैं। जहां ये मेला लग रहा है वहां सर्दियों में खेती होती है। सभी किसान खेती में व्यस्त रहते हैं उनके पास समय नहीं रहता और तो और उस समय उनके पास उत्सव मनाने के लिए पैसा भी नहीं होता। चैत्र में किसान की फसल आती है वह उसे बेच कर अपनी हथेली पर कुछ रूपये पाता है तब उसका मन भी उत्सव मनाने के लिए व्याकुल होता है और वह धू से उत्सव मनाता है पूरे नौ दिन का। नववर्ष के पहले दिन से दशमी तक दिल खोल कर उत्सव मनाता है। बस यही कारण है इन दिनों मेले का आयोजन करने का।

अब चलो मैं अपने गांव के मेले का वर्णन करता हूँ- यूं तो मेरा गांव
का नाम झांकरी है और आज के इस मेले का आयोजन पास ही के एक अन्य गांव ककरधा में किया गया यहां वर्षों पुराना मंदिर है - बसईया वाली माता का मंदिर। जिसकी छत्र छाया में इस मेले का आयोजन किया जाता है। माता के मेले में सभी समाज, जाति, धर्म के लोग आते हैं मेला सुबह से शुरू हो जाता है दिन चढ़ते-चढ़ते लोगों की संख्या बढ़ती जाती है। मेले में जिधर देखूं उधर श्रद्धालू चाट-पकौडी के ढेले, बेर बेचते साईकिल वाले-बर्फ वाले और ठण्डा-गर्म सब मिल रहा था।

गांव के मेले की एक नहीं अनेक खाशियत हैं मेला परिसर में कदम रखने से पहले ही आपके चेहरे पर फोकट का पाउडर लगने लगता है अरे भई! खेतों की उड़ती धूल थोडे ही देखती है कि आप कौन की बहुराष्ट्रीय या राष्ट्रीय कंपनी का पाउडर लगाते हैं। यहाँ तो आपको सूट करे या न करे एक ही पाउडर लगेगा चाहे आप अपने चेहरे को कितना ही बचाने की कोशिश करें। बच नहीं पाएगें। इधर धूल उडती है उधर चाट बन रही होती है। मैंने देखा कि चाट बनाने वाला जितने मसाले नहीं मिला पाता होगा उतनी उसमें धरती से उडी धूल मिल जाती है। फिर भी लोग मजे से खाते हैं और बच्चे तो अगर नहीं दिलाई तो रोने लगते हैं। आस-पास के गांव से लोग बैलगाडियों में, ट्रेक्टर में, जीप आदि में भर-भर कर आते हैं। पार्किंग की भी गजब व्यवस्था है बिना किसी प्रशासन की मदद के सुव्यवस्थित रहती है। इतनी सुव्यवस्थित कि हर बंदे को पता होता है कि कहाँ किस गांव के ट्रेक्टर-गाडी खडी होंगी। शहर से भी कोई पहुचता है तो उसे रेडियो रूम से अनाउन्स नहीं करवाना पड़ता कि फला व्यक्ति कहाँ पर है। वैसे वहाँ रेडियो रूम होता भी नहीं है। हर साल यथा स्थान लोग अपने वाहन खड़े करते हैं। गांव से लोग हलवा, पूड़ी, सब्जी, विभिन्न प्रकार के व्यंजन बना कर लाते हैं और सब मिल जुल कर खाते हैं। लडकियों और छोटे बच्चों के बड़े मजे होते हैं। क्यों? अरे भई! उन्हें सभी बड़े लोग मेला देखने के लिए पैसे देते हैं। मै छोटा था तब मुझे भी मिलते थे पर आज तो उल्टा हुआ, मेले में पंहुचते ही जेब ढीली हो गयी और जब तक मेले में रहा छोटे भाई-बहन, भतीजे-भान्जे जिद पर रहे। हाथी दिला दो, घोड़ा दिला दो, ट्रेक्टर, गाड़ी दिला दो। कैसे-कैसे पीछा छुडया मैं ही जानता हूँ।
सभी आने वाले लोग माँ बसईया वाली के दर्शन को जाते और अपनी मनोकामनाएं उसके समक्ष रखते। अच्छा एक बात ओर गांव वाले माता रानी को खुश करने के लिए नेजा और जवारे लेकर आते हैं। ( नेजा- ध्वज पताका, 15 से 20 फीट लम्बे बांस को रंगीन वस्त्रों में लपेटकर उस पर गुब्बारे, खिलौने आलि से उसे सजा कर लाया जाता है। जवारे- धान के अंकुर)। सभी गांव वालों में हौड रहती है कि किस गांव की ओर से कितना ऊंचा नेजा माता के दरबार में लाया जाएगा।
गांव के मेले में सभी प्रकार की दुकानों का प्रबंध रहता है। विशेष रहता है महिलाओं के श्रंृगार की सामाग्री का। महिलाओं की सौदर्य प्रसाधनों की दुकानों का आयोजन अलग सेक्शन में होता है। अगर आप पुरूष हैं तो भूल कर भी वहां मत जाना। वरना पुलिस बैंड बजा देगी।
जैसे-जैसे सांझ ढलने लगती है लोग अपने घरों की ओर लौटने लगते हैं, साथ ही मेले का एक अन्य आकर्षण की तैयारी भी तेज होने लगती है। वो है- दंगल। दूर-दूर स्थानों से प्रत्येक वर्ष दंगल में कुश्ती लडने के लिए पहलवान आते हैं। दंगल में जब पहलवानो का नाम पुकारा जाता है तो अनायस ही बचपन में पढ़ी कविता - कोई पहलवान अंबाले का, कोई पहलवान पटियाले का, की याद आ जाती है। दंगल में पहलवाने के लिए ईनाम की जो बोली लगाई जाती है उसे झंडी कहते हैं। गबरू-गबरू जवान जब कुश्ती करते हैं तो धरती का भी सीना डोलने लगता है। और कुश्ती के आयोजन के पश्चात मेला समाप्त हो जाता है। लोग अपने वाहनों से घर की ओर भागने लगते हैं। जब गांवो में यांत्रिक वाहनो की इतनी पंहुच नहीं थी तब की यादें आज भी ताजा है। गांव वाले मेले से लौटते में बैल गाडियों की रेस लगाते थे। इस रेस में जीतने के लिए सभी किसान अपने बैलों को पूरे साल भर खूब खिलाते-पिलाते थे। लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। हम आधुनिक हो गये हैं न।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

मेरा भारत महान है, मुझे इस पर गर्व है


विश्व भर के इतिहासकारों, लेखकों, राजनेताओं और अन्य जानी मानी हस्तियों ने भारत की प्रशंसा की है और शेष विश्व को दिए गए योगदान की सराहना की है। जबकि ये टिप्पणियां भारत की महानता का केवल कुछ हिस्सा प्रदर्शित करती हैं, फिर भी इनसे हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व का अनुभव होता है।
मेरे देश भारत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध व्यक्तियों के विचार -
* "हम सभी भारतीयों का अभिवादन करते हैं, जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया, जिसके बिना विज्ञान की कोई भी खोज संभव नहीं थी।!"
- एल्बर्ट आइनस्टाइन (सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी, जर्मनी)

* "भारत मानव जाति का पालना है, मानवीय वाणी का जन्म स्थान है, इतिहास की जननी है और विभूतियों की दादी है और इन सब के ऊपर परम्पराओं की परदादी है। मानव इतिहास में हमारी सबसे कीमती और सबसे अधिक अनुदेशात्मक सामग्री का भण्डार केवल भारत में है!"
- मार्क ट्वेन (लेखक, अमेरिका)

* "यदि पृथ्वी के मुख पर कोई ऐसा स्थान है जहां जीवित मानव जाति के सभी सपनों को बेहद शुरुआती समय से आश्रय मिलता है, और जहां मनुष्य ने अपने अस्तित्व का सपना देखा, वह भारत है।!"
- रोम्या रोलां (फ्रांसीसी विद्वान)

* "भारत ने शताब्दियों से एक लम्बे आरोहण के दौरान मानव जाति के एक चौथाई भाग पर अमिट छाप छोड़ी है। भारत के पास उसका स्थान मानवीयता की भावना को सांकेतिक रूप से दर्शाने और महान राष्ट्रों के बीच अपना स्थान बनाने का दावा करने का अधिकार है। पर्शिया से चीनी समुद्र तक साइबेरिया के बर्फीलें क्षेत्रों से जावा और बोरनियो के द्वीप समूहों तक भारत में अपनी मान्यता, अपनी कहानियां और अपनी सभ्यता का प्रचार प्रसार किया है।"
- सिल्विया लेवी (फ्रांसीसी विद्वान)

* "सभ्यताएं दुनिया के अन्य भागों में उभर कर आई हैं। प्राचीन और आधुनिक समय के दौरान एक जाति से दूसरी जाति तक अनेक अच्छे विचार आगे ले जाए गए हैं। . . परन्तु मार्क, मेरे मित्र, यह हमेशा युद्ध के बिगुल बजाने के साथ और ताल बद्ध सैनिकों के पद ताल से शुरू हुआ है। हर नया विचार रक्त के तालाब में नहाया हुआ होता था . . . विश्व की हर राजनैतिक शक्ति को लाखों लोगों के जीवन का बलिदान देना होता था, जिनसे बड़ी तादाद में अनाथ बच्चे और विधवाओं के आंसू दिखाई देते थे। यह अन्य अनेक राष्ट्रों ने सीखा, किन्तु भारत में हजारों वर्षों से शांति पूर्वक अपना अस्तित्व बनाए रखा। यहां जीवन तब भी था जब ग्रीस अस्तित्व में नहीं आया था . . . इससे भी पहले जब इतिहास का कोई अभिलेख नहीं मिलता, और परम्पराओं ने उस अंधियारे भूतकाल में जाने की हिम्मत नहीं की। तब से लेकर अब तक विचारों के बाद नए विचार यहां से उभर कर आते रहे और प्रत्येक बोले गए शब्द के साथ आशीर्वाद और इसके पूर्व शांति का संदेश जुड़ा रहा। हम दुनिया के किसी भी राष्ट्र पर विजेता नहीं रहे हैं और यह आशीर्वाद हमारे सिर पर है और इसलिए हम जीवित हैं. . .!"
- स्वामी विवेकानन्द (भारतीय दार्शनिक)


* "यदि हम से पूछा जाता कि आकाश तले कौन सा मानव मन सबसे अधिक विकसित है, इसके कुछ मनचाहे उपहार क्या हैं, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर सबसे अधिक गहराई से किसने विचार किया है और इसकी समाधान पाए हैं तो मैं कहूंगा इसका उत्तर है भारत।"
- मेक्स मुलर (जर्मन विद्वान)

* "भारत ने चीन की सीमापार अपना एक भी सैनिक न भेजते हुए बीस शताब्दियों के लिए चीन को सांस्कृतिक रूप से जीता और उस पर अपना प्रभुत्व बनाया है।"
- हु शिह (अमेरिका में चीन के पूर्व राजदूत)

* “दुनिया के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां एक बार जाने के बाद वे आपके मन में बस जाते हैं और उनकी याद कभी नहीं मिटती। मेरे लिए भारत एक ऐसा ही स्थान है। जब मैंने यहां पहली बार कदम रखा तो मैं यहां की भूमि की समृद्धि, यहां की चटक हरियाली और भव्य वास्तुकला से, यहां के रंगों, खुशबुओं, स्वादों और ध्वनियों की शुद्ध, संघन तीव्रता से अपने अनुभूतियों को भर लेने की क्षमता से अभिभूत हो गई। यह अनुभव कुछ ऐसा ही था जब मैंने दुनिया को उसके स्याह और सफेद रंग में देखा, जब मैंने भारत के जनजीवन को देखा और पाया कि यहां सभी कुछ चमकदार बहुरंगी है।”
- किथ बेलोज़ (मुख्य संपादक, नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी)











शुक्रवार, 27 मार्च 2009

आओ मिलकर मनाएं अपना नववर्ष


आज से दस-एक साल पहले की ही बात है मैं तब से ही इस बात को जानता हूँ कि असल में हमारा नववर्ष कौन-साहै ? 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला या चैत्र शुल्क प्रतिपदा से। जब मैं अपने दोस्तों से इस बारे में बात करता था औरकरता हूँ तो उन्हें सिर्फ यही पता होता है कि नववर्ष को 1 जनवरी को ही आता है। मुझे बहुत दुख होता है कैस हमविदेशी त्यौहारों के चक्कर में फंस कर अपने त्यौहारों को भूलते जा रहे हैं ? अच्छा जब मैं उनसे पूछता हूँ कि 1 जनवरी से नववर्ष मनाने का क्या वैज्ञानिक कारण है ? इस दिन ऐसा क्या हुआ जो कि इसे नववर्ष की शुरूआत केरूप में मनाया जाता है। सभी अपनी बगलें झांकते नजर आते हैं। हाँ , एक जबाब जरूर होता है इस दिन ईस्वीकैलेण्डर बदलता है और कोई औचित्य कारण उनके पास नहीं होता।
पहले उस कैलेण्डर की विसंगतियों पर चर्चा करते है जिसके हम गुलाम है। मानसिक गुलाम -
1952 में ‘‘सांइन्स एण्ड कल्चर’’ पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट कहती है -
ईसवी सन् का मौलिक सम्बन्ध ईसाई पन्थ से नहीं है। यही तो यूरोप के अर्ध सभ्य कबीलों में ईसा मसीह के बहुतपहले से ही चल रहा था।
इसके एक वर्ष में 10 महीने (304 दिन) होते थे। बाद में राजा पिम्मालियस ने दो माह (जनवरी, फरवरी) जोड़ दिएतब से वर्ष 12 माह (355 दिन) का हो गया। यह ग्रह की गति से मेल नही खाता था। तो जूलियर सीजर ने इसे 365 दिन 5 घंटे 52 मिनट 45 सेकण्ड का करने का आदेश दिया। 3 वर्ष तक 365 दिन चोथे वर्ष फरवरी में 29वीं तारीखबढ़ाकर 366 दिन कर लिए जाते हैं।
अब इसमें पंगा ही पंगा है। क्या 5 घंटे 52 मिनट 45 सेकण्ड को 4 से गुणा करने पर 24 घंटे का पूरा दिन बनपाएगा ? नहीं इसमें की उनकी की गणना से सवा सात मिनट का अन्तर रह जाएगा। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरार जी देसाई फंस गए थे 29 फरवरी के फेर में उनका जन्मदिन 29 फरवरी को पड़ता था। ईसवी कैलेण्डर कीगड़बड़ से देसाई जी 60 जन्मदिन नहीं मना पाए।
ठीक इसी तरह हिजरी सन् 356 दिन का होता है। सौर गणना से प्रायः 10 दिन कम। मौलाना साहब हिन्दू पंचांगको देखे बिना बतलाने में असमर्थ रहते हैं कि मौसमे बहार और मौसमें खिजां उनके किस महीने में पड़ेगी। जबकिहिन्दुस्तानी कैलेण्डर में तय है कि किस माह मे कौन सी ऋतु आएगी।

भारतीय काल गणना
एक अंग्रेज अधिकारी ने पं. मदनमोहर मालवीय से पूछा कि ‘‘कुम्भ में इतना बड़ा जन सैलाब बगैर किसी निमंत्रणकार्ड के कैसे जाता है ? तब पंडित जी ने उत्तर दिया - छः आने के पंचांग से।
अपने देश के गांवों में, शहरों में, वनो में, पहाड़ों पर या भारत के बाहर सैंकड़ो मील दूर विदेशों में हिन्दू कहीं भी रहेवह पंचांग जानता है तो अपने में त्यौहार, उत्सव, कुम्भ, विभिन्न देव स्थानों पर लगने वाले मेले की तिथिंया बगैरआंमत्रण, सूचना के उसे मालूम होती हैं यही नहीं सौ वर्ष बाद किस दिन कहां कुम्भ होगा, दीपावली कब होगी यहभी ज्योतिषी किसी भी समय बता सकता है।
बहुत महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक बात है। एक समय था जब कालगणना का केन्द्र बिन्दु उज्जैन था। जिस प्रकार आज ग्रीनविच को केन्द्र मानकर गणना की जाती है, उस प्रकार उज्जैन कालगणना का मध्य बिन्दु था। क्योंकि पृथ्वी व सूर्य की अवस्थिति के अनुसार संसार का केन्द्र उज्जैन ही है। इस कारण उज्जैन का महाकाल की नगरी माना गया था।

भारतीय नववर्ष से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पक्ष -
* चैत्र शुल्क प्रतिपदा के दिन ही बासंतिक नवरात्र का आरंभ होता है।
* सृष्टि की रचना भी ब्रह्मा ने इसी दिन की थी।
* त्रेतायुग में प्रभु श्री राम का राज्यभिषेक इसी दिन हुआ।
* महाभारत के धर्मयुद्ध में धर्म की विजय हुई और राजसूय यज्ञ के साथ युधिष्ठिर का नया संवत्
प्रारम्भ हुआ।
* महान सम्राट विक्रमदित्य ने इसी दिन विक्रम संवत् आरम्भ किया।
* संत झूलेलाल का जन्मदिन।
* गुरू अंगददेव जी का जन्मदिवस।
* महार्षि दयानंद सरस्वती आर्य समाज की स्थापना प्रतिपदा को ही की थी।
* इस दिन वसन्त का वैभव - नव किसलयों का प्रस्फुटन, नव चैतन्य, नवोत्थान, नवजीवन का प्रारंभ
कर मधुमास के रूप में प्रकृति का नया श्रृंगार करती है।

चुभने वाली बात -
हमारे वे साथी जो अपने आप को प्रगतिशील कहते हैं उन त्यौहारों का मनाने की अपील जोर-शोर
से करते हैं जिनका एक तो हमारी संस्कृति से कुछ लेना देना नहीं हैं। जबकि उन त्यौहारों का बड़े
भौड़े तरीके से मनाया जाता है। 31 दिसम्बर की रात को जिस तरह के नाटक समाज समाज हो
होते हैं सब जानते है। सिर्फ उस दिन नववर्ष मनाने के नाम पर हुडदंग होता है।
जरागौर करना एक ओर वह नववर्ष है। जिसे शराब पीकर आधी रात को सड़कों पर निकल कर
हमारे युवा मनाते है दूसरी ओर हमारा अपना नववर्ष जिसे बड़ी शालीनता के साथ सूर्य की रश्मियों
के स्वागत के साथ मनाया जाता है।

हमारा दुर्भाग्य -
हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज भी हम अंग्रेजी कैलेण्डर के हिसाब से चल रहे हैं।
स्वतन्त्र भारत की सरकार ने राष्ट्रीय पंचाग निश्चिित करने के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाॅ. मेघनाथ
साह की अध्यक्षता मेंकैलेण्डर रिफार्म कमेटीका गठन किया था। इस कमेटी ने विक्रम संवत को
राष्ट्रीय संवत बनाने की सिफारिश की थी।
लेकिन दुर्भाग्यवश................ जैसा हमेशा होता आया है ............. अंग्रेजी मानसिकता के नेतृत्व को यह
पसन्द नहीं आया।
अब समय है जागने का अपने आप को पहचानने का। समाज में जो करवट बदल रहा है।
उसे महशूस किया जा रहा है। उसी का परिणाम है। दस साल पहले भारतीय नववर्ष का इतनी
धूमधाम के साथ नहीं मनाया जाता था पर अब अंतर आया है। लोग फिर से अपना नववर्ष पहचाने
लगे हैं। अक्सर 1 जनवरी का मैंने कई लोगों का यह कहते सुना है - क्षमा करे यह हमारा नववर्ष
नहीं है। हमारा नववर्ष तो चैत्र शुल्क प्रतिपदा को आता है।
सभी मित्रों को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।




सोमवार, 23 मार्च 2009

मुझसे ज्यादा खुशकिस्मत कौन होगा ?

आज सुबह से ही सोच रहा था क्या लिखूं-क्या लिखूं? ऐसे महान क्रांतिकारी के बारे में जो इस भारत देश के नौजवानों का आदर्श है। भारत का ऐसा कोई युवा नहीं होगा जो भगत सिंह के बारे में न जानता हो और एक बात भगत सिंह सर्वाधिक पंसद किये जाने वाले भारत माता के सपूत हैं। यह बात इंडिया टुडे द्वारा सन् 2008 में किये गए सर्वेक्षण से पता चलता है जिसमें भगत सिंह को 60 महान भारतीयों में प्रथम महान भारतीय माना गया। इंडिया टुडे के इस सर्वेक्षण के अनुसार उन्हें ३७% भारतीयों ने उन्हे भारत माता का महानत सपूत बताया। इसी कारण सुबह से पशोपेश में था क्या लिखूं ? नहीं लिखू तो अपने लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता। तब सोचा उनके द्वारा लिखे गये पत्र को ही लिखते हैं जिससे उनका भारत के प्रति अगाध प्रेम छलकता है। हाँ इसके बाद जरूर एक निजी अनुभव लिखूंगा जिसने मुझे बहुत पीढ़ा दी थी।
फांसी के एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को, सेन्ट्रल जेल के ही 14 नम्बर वार्ड में रहने वाले बंदी क्रांतिकारियों ने भगत सिंह के पास एक पर्चा भेजा- ‘सरदार, यदि आप फांसी से बचना चाहते हो तो बताओ। इन घड़ियों में शायद कुछ हो सके।’ भगत सिंह ने उन्हे यह उत्तर लिखा-
जिन्दा रहने की ख्वाहिश कुदरती तौर पर मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन मेरा जिन्दा रहना मशरूत(एक शर्त पर) है, मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जिन्दा रहना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिन्दुस्थानी इकंलाब पार्टी का निशान बन चुका है और इकंलाब-पसन्द पार्टी के आदर्शों और बलिदानों ने मुझे बहुत ऊंचा कर दिया है। इतना ऊंचा कि जिन्दा रहने की सूरत में इससे ऊंचा मैं हरगिज नहीं हो सकता।
आज मेरी कमजोरियां लोगों के सामने नहीं है। अगर मैं फांसी से बच गया तो वह जाहिर हो जाएंगी और इंकलाब का निशान मद्धिम पड़ जायेगा या शायद मिट ही जाये, लेकिन मेरे दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते फांसी पाने की सूरत में हिन्दुस्थानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए बलिदान होने वालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि इन्कलाब को रोकना इम्पीरियलिज्म(साम्राज्यवाद) की तमामतर शैतानी शक्तियों के बस की बात न रहेगी।
हां, एक विचार आज भी चुटकी लेता है। देश और इन्सानियत के लिए जो कुछ हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवां हिस्सा भी मैं पूरा नहीं कर पाया। अगर जिन्दा रह सकता, तो शायद इनको पूरा करने का मौका मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
इसके सिवा कोई लालच मेरे दिल में फांसी से बचे रहने के लिए कभी नहीं आया। मुझसे ज्यादा खुशकिस्मत कौन होगा? मुझे आजकल अपने आप पर बहुत नाज है। अब तो बड़ी बेताबी से आखिरी इम्तिहान का इन्तजार है। आरजू हे कि यह और करीब हो जाये।
आपका साथी
भगत सिंह



सोमवार, 16 मार्च 2009

मैंने फिर से देखा ग्वालियर का किला


यूं तो मैंने ग्वालियर का किला कई बार देखा था। पर कल की बात ही अगल थी। कल जो देखा था, वो अभी तक नहीं देखा था। किले को यूं देखने का अंदाज भी कहाँ था, इससे पहले। फिर आज साथ मे भी तो गजब के लोग थे। एक तो हमारे आदरणीय शिक्षक श्री जयंत तोमर जिनके साथ किला-दर्शन का कार्यक्रम लगभग ड़ेढ साल से टल रहा था। जब मैंने जीवाजी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पत्रकारिता के गुर सीखने के लिए दाखिला लिया। आज ये दिली तमन्ना भी पूरी हो गयी। गुरू माँ श्रीमति नीलम तोमर का भी तो स्नेही सानिंध्य मिला था और फिर साथ में मनमौजी मित्रो की टोली भी तो थी। तो भैया मजे तो आने ही थे। अब तो हम लोगो का दिमाग पत्रकारिता वाला भी हो गया है सो जानकारी भी समेटना था। तो शाम तक समेटी भी। अब आगे चलते हैं................
सबसे पहले हमने देखा मानमंदिर महल, जिसका निर्माण राजा मानसिंह ने करवाया। राजा मानसिंह को एक ओर वजह से दुनिया में पहचाना जाता है संगीत के क्षेत्र में। उन्हें ध्रुपद गायन का जनक माना जाता है। इतिहास की बाते ज्यादा नहीं करूंगा। इस पर यहीं ब्रेक लगाते हैं। मान मंदिर में चमगादड़ो की संख्या ठीक उसी तरह बढ़ रही है जिस तरह भारत की जनसंख्या। महल की दीवालों को चमगादडो की लघुशंका-दीर्घशंका से बचाने के लिए छत पर लोहे के जाल लगा दिए हैं। उन जालों पर चमगादड़ अपने चिरपरिचित अंदाज में उल्टे लटके रहते हैं। यहां नक्काशी, रंग-रोगन, रानी झूलाझगृह, फांसीघर, केशर कुंड और टेलीफोन देखा और खूब फोटो खींचे। टेलीफोन - संभवत: एक महल से दूसरे महल में बात करने के लिए पोल। यहाँ से निकल कर 80-81 खम्बो पर बनी छतरी में बैठकर भोजन किया। होली पर बनाई हुई मिठाई भी सब घर से लाए थे। यहां भोजन करते समय बाजीराव भोजन की याद आ गई। बाजीराव भोजन- जब सैनिक लम्बी दूरी पर युद्धों के लिए निकलते थे तो रास्ते में घोडों पर बैठकर ही खाना खाया करते थे। हाथ में रोटी, गुड़-साग लेकर। लेकिन हमने यहां घोडो पर बैठकर खाना नहीं खाया। पेट भर गया हो तो चलें.............
मान मंदिर के सामने बने छोटे-छोटे महलों की ओर। सबकी दुर्दशा देख कर तो बुरा लगा। जर्जर हालात। क्या हो रहा है? हमारी ऐतिहासिक धरोहरों के रख-रखाव की कैसी व्यवस्था है? तरह-तरह के क्रोधित प्रश्र मन में कौंधने लगे। हम इन महलों की ऊंची-ऊंची छतों पर गये। वहां से अपने प्यारे शहर का खूबसूरत नजारा देखते ही बनता था। छोटे खिलौनों से मकान डिब्बे-डिब्बेनुमा, सडक़ें उलझे हुए काले धागों की तरह, हरियाली तो यूं गाहब सी दिखी जैसे शहर से रूठ कर कहीं चली गई हो। जैसे कवि पत्नि अपने पति की बोंरिग कवितायों से उकता कर रूठ कर मायके चली गई हो। उफ! ये गर्मी। सब गर्मी से परेशान। बादलों ने देखा बच्चे परेशान हो रहे हैं गर्मी से, तुरंत गए, न जाने कहां से पानी भर लाए और सूरज दादा को ओट में ले कर शुरू हो गए। अभी तक उफ..! गर्मी थी अब आहा.. क्या मौसम आया है। चलो अब और आगे चलते हैं।
जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल। समझे गुरूद्वारे आ गए हैं। दाता बंदी छोड़ गुरूद्वारा। गुरूग्रंथ साहिब और महान आत्मा गुरू हरगोविन्द सिंह को मत्था टेका। सिक्ख सम्प्रदाय ने सदैब ही भारत और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया है और सदैव इस हेतु वह सदैव आगे रहा है। गुरू हरगोविन्द साहब को जब मुगल बादशाह ने रिया करने के लिए आदेश जारी किया तो गुरू साहिब ने कह दिया मैं अकेला कैद से मुक्त नहीं होना चाहता। तब गुरू गोविन्द जी का दामन पकड़ कर 51 अन्य राजा कैद से मुक्त हुए थे।
अब आते हैं सास-बहू के मंदिर पर। एकता कपूर के धारावाहिक की सास-बहू नहींं। सास-बहू तो अपभ्रंस है, असली नाम है सहस्त्रबाहू का मंदिर। खूबसूरत दो मंदिरों का जोडा। जिन्हें देखे बिना शायद ही किले से कोई पर्यटक वापस जाता होगा।
अब तक जो मैंने नहीं देखा था- लाइट एण्ड साउण्ड शो। इसके बारे मैं सुनता तो अक्सर था पर कल प्रत्यक्ष देखा-सुना। शो के प्रांरभ होने का हम बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। इस बीच रात्री में किले से ग्वालियर का जो नजारा देखा तो देखता ही रह गया। कृत्रिम प्रकाश में झिलमिलाता मेरा शहर कितना खूबसूरत लग रहा था। बिलकुल नई दुल्हन की साड़ी की तरह, जिस पर हजारों चमचमाते सितारें जडे होते हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की जादू भरी आवाज के साथ हमारी इंतजार की घडियाँ समाप्त हुई। गवालियर किले का इतिहास पूरे किले पर गूंजने लगा। क्या गजब की लाइटिंग हो रही थी, किले का अलग ही रूप-रंग निखर कर सामने आ रहा था। सांउड का क्या कहूँ? इस अनुभव को में शब्दों में बांधने में, मैं खुद को असमर्थ पा रहा हूँ। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। इसके लिए तो आपको ग्वालियर किले पर ही आना पडेगा। इस कार्यक्रम ने दिन भर की थकान भुला दी। घर लौटते में सोच रहा था कितना खूबसूरत है किला........


शनिवार, 7 मार्च 2009

मेरे हिस्से में हरदम जूठन ही आया

८ मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
जब मैं इस दुनिया में आई
तो लोगों के दिल में उदासी

पर चेहरे पर झूठी खुशी पाई।
थोड़ी बड़ी हुई तो देखा,

भाई के लिए आते नए कपड़े
मुझे मिलते भाई के ओछे कपड़े।

काठी का हाथी, घोड़ा, बांदर आया
भाई थक जाता या

खेलकर उसका मन भर जाता

तब ही हाथी, घोड़ा दौड़ाने का,
मेरा नंबर आता।

मैं हमेशा से ये ही सोचती रही
क्यूं मुझे भाई का पुराना बस्ता मिलता
ना चाहते हुए भी
फटी-पुरानी किताबों से पढऩा पड़ता।
उसे स्कूल जाते रोज रूपया एक मिलता
मुझे आठाने से ही मन रखना पड़ता।

थोड़ी और बड़ी हुई, कॉलेज पहुंचे
भाई का नहीं था मन पढऩे में फिर भी,
उसका दाखिला बढिया कॉलेज में करवाया
मेरी इच्छा थी, बहुत इच्छा थी पर,
मेरे लिए वही सरकारी कन्या महाविद्यालय था।

और बड़ी हुई
तो शादी हो गई, ससुराल गई
वहां भी थोड़े बहुत अंतर के साथ
वही सबकुछ पायाथोड़ी बहुत बीमार होती तो
किसी को मेरे दर्द का अहशास न हो पाता
सब अपनी धुन में मगन -
बहु पानी ला, भाभी खाना ला
मम्मी दूध चाहिए, अरे मैडम चाय बना दे।

और बड़ी हो गई,
उम्र के आखरी पडाव पर आ गई
सोचती थी, काश अब खुशी मिलेगी
पर हालात और भी बद्तर हो गए
रोज सबेरा और संध्या बहु के नए-नए
ताने-तरानों से होता।

दो वक्त की रोटी में भी अधिकांश
नाती-पोतों का जूठन ही मिलता।
अंतिम यात्रा के लिए,
चिता पर सवार, सोच रही थी-
मेरे हिस्से में हरदम जूठन ही क्यों आया।

मंगलवार, 3 मार्च 2009

मेरे मोहल्ले के लडक़े अब क्रिकेट नहीं खेलते



आज मैं बैठा-बैठा सोच रहा था कि आज-कल मेरी कॉलोनी के लडक़ों को क्या हो गया है। न तो वे कबड्डी खेलते हैं, न फुटबॉल, न हॉकी और तो और सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट भी नहीं खेलते। जब हम उनकी उम्र के थे तो उठा बैट-बॉल सुबह से ही क्रिकेट के मैदान की ओर निकल जाते थे। माँ पुकारते ही रह जाती थी - बेटा खाना तो खा जा, बेटा नहा तो ले। पर हमारी मस्तमौला क्रिकेट टीम कहां अपनी माँ की पुकार सुन कर रूकती थी। उसे तो मैदान कीपुकार जोर से सुनाई पड़ती थी। तो चले जाते थे माँ की आवाज को अनसुना कर। पर शाम को तो घर वापस ही आना पडता था। तब माँ की डाँट से कौन बचाता। खैर उन दिनों को याद करता हूँ तो बहुत से बिझुडे दोस्तों की भीयाद ताजा हो जाती है। कुछ ऐसे ही थे हमारे वो दिन। पर आज देखता हूँ कि मेरे कॉलोनी के लडक़े कहीं नही जाते।हाँ गली के नुक्कड पर, चौराहे पर जरूर खडे मिल जाते हैं। वहाँ वे प्रतिदिन बिना नागा के जाते हैं। पता क्यूँ ? चलो मैं बताता हूँ वो इसलिए कि उनके जीवन जीने का टेस्ट बदल गया है। उन्हे अब खेलने में मजा नहीं आता। बल्कि उन्हें चौराहों पर खडे होकर फालतू की बातें और वहाँ से गुजरने वाली लडकियों को देखना और मौका पाकर उन्हें तंग करना अच्छा लगता है। अब उनके जीवन का टेस्ट इसमें है। और हाँ एक और जादू की चीज के बारे में तो बताना ही भूल गया होता। तो सुनो वो जादू की चीज है मोबाइल फोन। क्या बात है? आज कल हर किसी लडक़े के जेब में एक से एक बेहतरीन फीचर युक्त मोबाइल आपको मिल जाएगा। भले ही बंदा कुछ काम धंधा नहीं करता हो पर मोबाइल का खर्चा तो निकाल ही लेता है। आपको क्या लगता है ये मोबाइल पर थोड़ा बहुत खर्च करते हैं। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप गलत हैं, कभी-कभी तो इनके मोबाइल का खर्चा आपके मोबाइल से बहुत अधिक आता है। क्यों? घण्टों मोबाइल पर जो चिपके रहते हैं, न नींद आती है, न भूख लगती है बस मोबाइल मोबाइल खेेलते रहते हैं। जब कभी अगर वे मैदान में भूले भटके पहुंच भी जाये तो यहां भी उनका मोबाइल पीछा नहीं छोड़ता। अब आप क्या सोचने लगे? बीच पिच पर वीरेन्द्र सहवाग की तरह उनकी माँ का भी फोन आता है। फोन तो आता है पर उनकी माँ का नहीं, उनकी मा-सूका का। वो भी ऐसी मासूका का जिसे अभी अपनी नाक पोंछना भी नहीं आता। खैर मैं तो सोच-सोच कर थक गया। अब आप ही सोचो मेरी कॉलोने के इन लडक़ों का क्या होगा? अरे हाँ यहकाथा सिर्फ मेरे कॉलोनी के लडक़ों की नहीं है, सर्वव्यापी है। जरा गौर से देखो अपने आस-पास। प्रयास करो उन्हें कबड्डी, हॉकी, फुटबाल के मैदान ले जाने का, नहीं तो कम से कम क्रिकेट के मैदान में ले जाकर तो खडा ही कर दो। क्योकि इनका खेलना जरूरी है।
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

पहल करने वालों में ''प्रथम'' थे सावरकर


स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की पुण्य तिथि पर विशेष - २६ फरवरी १९६६
अप्रितम क्रांतिकारी, दृढ राजनेता, समर्पित समाज सुधारक, दार्शनिक, द्रष्टा, महान कवि और महान इतिहासकार आदि अनेकोनेक गुणों के धनी वीर सावरकर हमेशा नये कामों में पहल करते थे। उनके इस गुण ने उन्हें महानतम लोगों की श्रेणी में उच्च पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया। वीर सावरकर के नाम के साथ इतने प्रथम जुडे हैं इन्हें नये कामों का पुरोधा कहना कुछ गलत न होगा। सावरकर ऐसे महानतम हुतात्मा थी जिसने भारतवासियों के लिए सदैव नई मिशाल कायम की, लोगों की अगुवाई करते हुए उनके लिए नये मार्गों की खोज की। कई ऐसे काम किये जो उस समय के शीर्ष भारतीय राजनीतिक, सामाजिक और क्रांतिकारी लोग नहीं सोच पाये थे।

वीर सावरकर द्वारा किये गए कुछ प्रमुख कार्य जो किसी भी भारतीय द्वारा प्रथम बार किए गए -
वे प्रथम नागरिक थे जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में उसके विरूद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठितकिया।
वे पहले भारतीय थे जिसने सन् 1906 में 'स्वदेशी' का नारा दे, विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी।
सावरकर पहले भारतीय थे जिन्हें अपने विचारों के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोनी पड़ी।
वे पहले भारतीय थे जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की।
वे पहले भारतीय थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का 'स्वाधीनता संग्राम' बताते हुए लगभग एकहजार पृष्ठों का इतिहास 1907 में लिखा।
वे पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश और ब्रिटिशसाम्राज्यकी सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया।
वे दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था।
वे पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे, जिसने एक अछूत को मंदिर का पुजारी बनाया था।
सावरकर ने ही वह पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कंाग्रेस मेंमैडम कामा ने फहराया था।
सावरकर ही वे पहले कवि थे, जिसने कलम-कागज के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायेंलिखीं। कहा जाता है उन्होंने अपनी रची दस हजार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षोंस्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वह किसी किसी तरह देशवासियों तक नहीं पहुच गई।
सन् 1947 में विभाजन के बाद आज भारत का जो मानचित्र है, उसके लिए भी हम सावरकर के ऋणी हैं। जबकांग्रेस ने मुस्लिम लीग के 'डायरेक्ट एक्शन' और बेहिसाब हिंसा से घबराकर देश का विभाजन स्वीकार कर लिया, तो पहली ब्रिटिश योजना के अनुसार पूरा पंजाब और पूरा बंगाल पाकिस्तान में जाने वाला था - क्योंकि उन प्रांतोंमें मुस्लिम बहुमत था। तब सावरकर ने अभियान चलाया कि इन प्रांतो के भारत से लगने वाले हिंदू बहुल इलाकोंको भारत में रहना चाहिए। लार्ड मांउटबेटन को इसका औचित्य मानना पड़ा। तब जाकर पंजाब और बंगाल कोविभाजित किया गया। आज यदि कलकत्ता और अमृतसर भारत में हैं तो इसका श्रेय वीर सावरकर को ही जाता है
भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्षों के इतिहास में वीर सावरकर का नाम बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखताहै। वीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। महान देशभक्त और क्रांतिकारी सावरकर ने अपनासंपूर्ण जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया। अपने राष्ट्रवादी विचारों के कारण जहाँ सावरकर देश को स्वतंत्रकराने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहे, वहीं देश की स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन संघर्षों से घिरा रहा।
ऐसे महान व्यक्तित्व को हमारा सादन नमन।