पश्चिम की नकल से अपनी तहजीब भूले भारतीय

>> शुक्रवार, १० अप्रैल २००९

भारत देश अपने आप में बहुत खास देश है। यहाँ की संस्कृति के चर्चे विश्व में किए जाते हैं, लेकिन आज यहाँ के हालात ऐसे हो चले हैं कि लोग पश्चिमी संस्कृति को ग्रहण कर रहे हैं और अपनी तहजीब को भूलते जा रहे हैं। हम जब भी यहाँ आते हैं और इस तरह से यहाँ की संस्कृति को विकृत होते हुए देखते हैं तो बड़ा बुरा-सा लगता है। यह बात न्यूयार्क निवासी कृष्ण कुमार गुप्ता और उनकी पत्नी श्रीमती सुधा गुप्ता ने नई दुनिया के पत्रकार से चर्चा के दौरान कही। उन्होंने कहा मुझे बड़ा दुख होता है कि दुनिया भारत की संस्कृति की ओर दीवानों की तरह देख रही है और हमारे लोग दूसरों की विकृत संस्कृति के पीछे आंख बंद करके दौड़ रहे हैं। कृष्ण कुमार जी मूलतः ग्वालियर के रहने वाले हैं, यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है। काम के सिलसिले में वे सन् 1981 में अमेरिका चले गये थे तब से वहीं रह रहे हैं। श्री गुप्ता ने बताया कि जिस तरह यहाँ की पीढ़ी भारतीय संस्कारों, परंपराओं से दूर हो रही है, अपनी संस्कृति में कमियाँ दिखा रही है वहीं न्यूयार्क में रहने वाले भारतीय आज भी भारतीय रहन-सहन (भारतीय कल्चर) ही पसंद करते हैं। उनके साथ आई उनकी पत्नी श्रीमती सुधा गुप्ता ने भी इस बात पर खेद प्रकट किया कि हम लोग अपने ही देश में अपने संस्कृति को खोते जा रहे हैं जबकि दुनिया भर में इसकी चर्चा है। जहाँ यहाँ की लड़कियों के बाद अब विवाहित महिलायें जींस पहनना चाहती हैं वहीं वहाँ की महिलायें भारतीय परिधान पहनना ही पसंद कर रहीं है और अपने बच्चो को भी भारतीय संस्कारों से शिक्षित कर रही हैं। उन्होनं कहा कि हमने अपने बच्चों को सिर्फ कर्म का धर्म ही सिखाया हैं यदि उनसे पूछा जाये कि तुम्हारा धर्म कौन-सा है तो वे कर्म को ही अपना धर्म बतायेगंे। भगवत गीता में भी यही लिखा है।
हमें लज्जा आनी चाहिए कि किस तरह दुनिया हमसे सीखना चाहती है और हम दुनिया को सिखाने की जगह भोग-विलास में डूबते जा रहे हैं। जिस संस्कृति (पश्चिमी संस्कृति) से वहाँ के लोग भाग रहे हैं हम उसे दीवानों की तरह अपनाते जा रहे हैं। उसके तमाम दुष्परिणाम हमें देखने को मिल रहे हैं। पश्चिमी संस्कृति के अवगुणों को देख कर ही संभवतः स्वामी दयानंद सरस्वती ने लोगो से कहा था - वेदों की ओर लौटो। हमें अपने आपको बचाना है और संस्कारों को जीवित रखना है तो अपनी जड़ो की ओर लौटना होगा। हम जिस आजादी, बोल्ड माइंड और खुलेपन की बात करते हैं उसी वातावरण में 28 वर्षों से रहने के बावजूद श्री गुप्ता और उनका परिवार आज भी भारतीय संस्कारो को अपनाते हैं बल्कि अपनाते ही नहीं जीते हैं। यही है भारतीयता का जादू। अभी भी समय है जाग जाओ, तन्द्रा तोड़ो, मत किसी के पीछे भागो। खुद को पहचानो। तुम औरों की नकल क्यों करते हो जबकि और आपकी नकल करना चाहते है खैर वैसे आप खुद समझदार हैं मैंने तो बस अपनी और श्री गुप्ता जी की बात से आपको अवगत कराने का प्रयास किया है बाकी आपकी समझ।

11 टिप्पणियाँ:

Dr. Smt. ajit gupta १० अप्रैल २००९ ११:३२ AM  

अच्‍छी पहल है। मेरी एक पुस्‍तक शीघ्र की बाजार में आने वाली है - सोने का पिंजर...अमेरिका और मैं। वर्तमान में धारावाहिक रूप से हिन्‍दयुग्‍म.काम पर आ रही है, आप इसे अवश्‍य पढ़ें।

www.जीवन के अनुभव १० अप्रैल २००९ ७:२५ PM  

baat to schhi kahi par parivartan bhi jaruri hai lekin ve parivrtan hamaare sanskaar aur sanskrati ko bhulakar nahi hone chahiye. jaisa desh vaisa bhes ki kahavat bhi hamaare desh mai gadi gai hai.

काजल कुमार Kajal Kumar १० अप्रैल २००९ १०:४९ PM  

घर का जोगी जोगड़ा...
बाहर का जोगी सिद्ध.

गर्दूं-गाफिल १२ अप्रैल २००९ ११:५३ AM  

धनात्मक लेखन के लिए बधाई । ऐसे प्रयासो की आवश्यकता है ।
अपना फ़ोन नम्बर दें।

alka sarwat १२ अप्रैल २००९ १२:४८ PM  

aapke dil dukhne ki bhi dwaa hai mere paas . bhaartiya sbhyatya ,sanskriti , bhartiya prakritic sampada aur jeewan-yaapan ke bhaartiya taur-treekon men hi hai is samasyaa ka ilaaz . in gwaliyar wasi ewam widesh waasiyon se kahiyegaa ki bhaartiya yuwaa apne khajaanon se antaagaafil nahin hain.
jai hind

Shama १३ अप्रैल २००९ ५:५९ PM  

Bohot khoob...aapki tippanee maine mere blogpe payee thee...jawab deneme der huee, kshama prarthi hun...
Profile me aapkee samvedansheelta padhke achhaa laga...anek shubhkamnayen!
Shama

Harkirat Haqeer १४ अप्रैल २००९ ५:३५ PM  

लोकेन्द्र जी,
अच्छे विषय पर चर्चा की है आपने ....सच है कि भारतीय संस्कृति की अपनी एक अमित छाप है जो विदेशों में हमेसा सराही जाती रही है ...शायद इसलिए भारतीय लड़कियों को विदेशों में ज्यादा पसंद किया जाता रहा है ....निश्चित रूप से यह हमारे लिए लज्जा का विषय है ....!1

Student for life १५ अप्रैल २००९ ६:४४ AM  

Bahut sateek dhang se aapne har pehlu ke saath nyay kiya hai. aapka post pad kar acha laga

vibhore १६ अप्रैल २००९ १०:५४ AM  

भाई बेहतर होगा अगर हम कहें की संस्कृति में खुलापन आता जा रहा है है ,ये जरूर हमारी मानसिक प्रवत्ति पर निर्भर है की उसे हम किस रूप में स्वीकार करते है,भारतीय संस्कृति शुरुआत से ही उदार रही है अर्थात दूसरी संस्कृति भी उसमे जल्दी ही घुक्मिल जाती है,लेकिन फिर उन लोगों को क्या कहें जो मानसिक पिछडेपन के शिकार है और हमेशा खामियां ही ढूँढना जानते है,पुरातनवादी रूदियों और गैर जरूरी परम्पराओं में ये समाज आखिर कब तक जकडा रहेगा,अगर हम संस्कृति में आ रहे इस बदलाव का विरोध कर रहे है तो फिर हमें इस आधुनिक युग को छोड़ कर उसी आदम युग में ही जीना चाहिए जिसकी बेडियाँ तोड़ कर हम आज इस मुकाम पर पहुंचे है और एक बात और कहूँगा की भारतीय संस्कृति के बारे में बोलने का अधिकार उन लोगों को नहीं है जो बरसों पहले अपनी मात्रभूमि छोड़ कर चले गए! महिलाओं और लड़कियों के जींस पहनने की बात अच्छी नहीं लगती उन्हें तो उनसे कहो की बापस देश में आयें और खादी अपनाएं और फिर बात करें संस्कृति की .....

O.L. Menaria २४ अप्रैल २००९ १०:०१ PM  

आपने न्यूयार्क निवासी गुप्ता दम्पति की पीड़ा का सार्थक वर्णन किया है। आज पश्चिम के लोग इस भोगवादी संस्कृति से उब चुके है एवं अब वे भारतीय संस्कृति को अपनाकर मानसिक शान्ति की तलाश कर रहे है। और हम हैं की पश्चिम की चमक दमक, विलासिता एवं खुलेपन में अपना उत्थान देख कर उसका अन्धानुकरण कर अपने को प्रगतिशीलता का तमगा लगाने को आतुर है। हमारे समाज ने आज से हजारों साल पहले इस विलासिता को भोगने के बाद उसके दुस्परिनामों से अवगत होने के बाद अध्यात्मिक सदाचार युक्त मर्यादित आचरण को स्वीकार किया. अब हमें दूर के ढोल सुहावने भले ही लगते हों पर एक दिन वापस आपनी मूल जगह पर आना होगा चूँकि पश्चिम की भोतिकतावादी स्वछंद जीवन शैली हमें अच्छाई कम एवं विकृतियाँ अधिक देने के साथ साथ एड्स जैसी घातक बिमारियों की सौगात भी दे रही है जिससे समाज में पूरे के पुरे परिवारों के समाप्त होने का खतरा बड़ता जा रहा है.

रचना त्रिपाठी ९ मई २००९ ८:२२ PM  

बहुत सही कहा आपने हमारे देश में बहुतायत ऐसे लोंग हैं जो अपनी सभ्यता से जी चुराते हैं ये बिल्कुल गलत है।

दिल दुखता है तो डॉक्टर से जरूर सम्पर्क करें।
धन्यवा।

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