मंगलवार, 29 जून 2010

... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?

क्या मुसलमान ऐसे हिन्दुओं का दिल जीत सकते हैं ?

इस लेख के बाद हो सकता है कुछ खास विचारधारा के ब्लॉगरों की जमात मुझे फास्सिट घोषित कर दे। हो सकता है मुझे कट्टरवादी, पुरातनंपथी, दक्षिणपंथी, पक्षपाती, ढकोसलावादी, रूढ़ीवादी, पुरातनवादी, और पिछड़ा व अप्रगतिशीस घोषित कर दिया जाए। इतना ही नहीं इस पोस्ट के बाद मुझ पर किसी हिन्दूवादी संगठन का एजेंट होने का आरोप भी मढ़ दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन मुझे डर नहीं, जो सच है कहना चाहता हूं और कहता रहूंगा। 

एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।



एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।
           इसी खानदान का उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।" पढ़ें.....
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।

>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।

>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास-
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?"

जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-
अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे।
- अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे)
- जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पढें....  वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
- एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका।
- बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी।
- नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं।
- आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

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भवदीय
लोकेन्द्र सिंह राजपूत
सब-एडिटर
पत्रिका, ग्वालियर
+919893072930
www.dildukhatahai.tk
www.apnapanchu.blogspot.com

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

मेरा होंसला आफजाई करें...

मेरे प्रिय साथियों मैं बहुत दिन से अपने ब्लोग पर नहीं आया। असल में एक तो अभी अभी नई सफर की शुरूआत की थी तो उस पर ही कदम जमाने की कोशिश कर रहा था। अब ठीक-ठीक पैर जम रहे हैं तो सोचा अपने साथियों से बातचीत हो जाए। यही सोच कर आपके बीच फिर से आ गया हूं। जानता हूं हमेशा की भांति आपका साथ मिलेगा। दो-चार इधर उधर की बातें हो जाएंगी। एक बात और कहना चाहूंगा असल में बात नहीं है एक निवेदन है कि मेरे इस ब्लॉग में कुछ तकनीकी परेशानी आ रही है इस वजह से मैं अपने नए ब्लॉग अपना पंचू पर जा रहा हूं आपसे विनम्र निवेदन है कि जिस तरह आपने मेरा यहां साथ निभाया उसी तरह वहां भी मेरा हौंसला आफजाई करते रहना।
आपका मित्र
लोकेंद्र सिंह राजपूत

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

जिन्दादिली का अहसास है ‘दिल दुखना’


वर्ल्ड हार्ट डे
क्या बात है जी? रोज... डे,.....डे,......डे और आज वर्ल्ड
हार्ट डे। अब आज सारे हृदयरोग याद आएगें। स्वास्थ्य संगठन, लेखक व पत्रकारो को रपट बनाने का मौका मिलेगा। सब अपने-अपने स्तर के आंकडे जुटाएगें कि इतना हजार व्यक्ति इस राज्य में, उतना उस राज्य में और पूरे भारत या विश्व में कुल इतने लाख लोग हृदय रोगों से पीड़ित हैं। खैर अपने को इससे कोई मतलब नहीं। आप सोच रहे होगे कि मैं दिल का मरीज नहीं हूं इसलिए मुझे इससे कोई मतलब नहीं। ऐसा ही सोच रहे हो ना?
इधर कान लाओं, लेकिन पहले वादा करो किसी से कहोगे नहीं, पक्का नहीं कहोगे ना। असल में मुझे भी दिल की बीमारी है। पता है मेरा दिल बहुत दुखता है इसीलिए तो मैंने अपने ब्लाॅग का नाम भी रख लिया दिल दुखता है
यार मैं बहुत परेशान हूं ‘दिल के दर्द’ से। अभी जवानी है खेलने-कूदने के दिन है, कुछ रचनात्मक कार्य करने दिन है पर, दिल है कि मानता नहीं। हमेशा उल्टी दिशा में, गलत जगह ध्यान देता है फिर दुखता है। खुद भी परेशान रहता और सवा पांच फुट के शरीर को भी फोकट में टेंशन देता हैं। अब आप ही बताओ भला इस उम्र में इसे क्या जरूरत है राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंता करने की। धर्म-अधर्म, गरीबी-भूखमरी की। क्या जरूरत है समाज के पचडे में टांग अड़ाने की। देखो जो चल रहा है वो तो चल ही रहा है किसी के उंगली करने से कुछ हो सकता है क्या? अच्छे-अच्छे मर गए, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, सुभाषचन्द्र, महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय इनके सुधारने से भी कुछ हुआ क्या? गांधी ने लाख कहा था ‘सुराज’ पर चलो, ‘स्वदेशी’ बनों, बताओ कहां चल रहे हैं हम?
मुझे पता है आपके दिमाग मे भी यहीं आया होगा कुछ तो नहीं बदला। कोई परिवर्तन तो नहीं आया। तो भाई ये भी गलत है परिवर्तन तो आता ही है। आया है तभी तो हमारा-तुम्हारा दिल दुखता है। अगर उनका दिल न दुखा होता तो हमारे दिल को कहां से दुखने की प्रेरणा मिलती। आपको पता है ‘दिमाग स्वार्थी होता है।’ बनिया हमेशा दिमाग से सोचता है लेकिन दिल के साथ ऐसा नहीं दिल में ही तो ‘दुनिया का दर्द’ पलता है। याद है कहावत ‘ये पत्थर दिल है’। किसी की पीढ़ा देखकर उसकी मदद के लिए आगे नही आने वाले के लिए कही जाती है। दिल ही तो दूसरो के लिए धड़कता है दिमाग सिर्फ अपने लिए। तभी तो ये कहावत नही बनी कि ‘इसका दिमाग पत्थर’ है।
लोग कहते भी है आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक धडकता है’ पर मेरा मानना कुछ अलग है असल में आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक उसकादिल दुखता है। तो भाई जिन्दगी जिंदादिली के साथ जीना है तो दिल को दुखाओ पर याद रखना दिल दूसरो के किए दुखे जिस दिन खुद किया दुखा तो लेने के देने पड़ जाएगें। बस थोडी सी सावधानी के साथ धडकने दो दिल को दुखने दो दिल को। जाते-जाते तुलसीदास जी की बात याद आ गई
परहित सरस धर्म नहीं भाई
पर पीढ़ा सम नहीं अधिमाई’’
तुलसी की इन पंक्तियों का क्या मतलब है सब जानते है और हां तुलसी का दिल जब तक उनकी पत्नि के हाड-मांस के शरीर के लिए दुखा उन्हें कोई नहीं जानता था। लेकिन जब पत्नि की उल्हाना पर जब उनके दिल का दर्द बदला तो विश्व विख्यात बन गए।

रविवार, 20 सितंबर 2009

वांटेड दक्षिण की पोक्किरी

जबलपुर में मुझे दो माह से ऊपर हो गया है... जब भी मन नही लगता पास ही की ज्योति टाकिज में फ़िल्म देखने चला जाता हूँ॥ इस तरह मैंने अब तक कुल जमा ज्योति टाकिज में तीन फिल्में देख ली है। पहली थी 'फॉक्स', दूसरी 'आगे से राईट' , अभी शनिवार को देखी 'वांटेड' । जिंदगी में इससे भी हाउस फुल शो देखे थे... लेकिन टिकिट कैसे ब्लैक होती है ये तो पहली बार ही देखा। ज्योति में अलग-अलग टिकिट के अलग अलग दाम है। १० रु जिसमे आपको ठीक परदे के नीचे वाली सीट पर बैठने का मौका मिलेगा। आप सर उठा कर फ़िल्म देखेंगे। साथ ही हीरो - हीरोइन को खास कर आइटम डांसर को पास से देखने का पुरा मौका। उसके बाद १५ रु, २५ रु, ३५ रु, और ५० रु की टिकटें भी होती है जैसी सुविधा वैसी टिकट। मुझे अच्छा सिस्टम लगा। हाँ तो मैंने पहली बार टिकिट ब्लैक होते देखी - १५ का २५ में। २५ का ५० में। लेकिन हमने तीन टिकिट ले ली विण्डो से 30 वाली

फ़िल्म - वांटेड, निर्देशक - प्रभुदेवा, निर्माता - बोनी कपूर
कलाकार - सलमान खान, आयशा टाकिया, प्रकाश राज , महेश मांजरेकर और अन्य

फ़िल्म की स्टार्टिंग मार-काट से होती है और मार-काट पर ही ख़त्म। फ़िल्म की स्टोरी पुराने स्टाइल की है जिसमे एक पुलिस वाला होता है जो अंडरवर्ल्ड का खत्म करने के लिए एक गुंडे के रूप में उनके गैंग में शामिल होता है... और फ़िर सबको मरना शुरू कर देता है। राधे(सलमान) गुंडे के रूप में ऐसा करता है। अकेले ही बन्दूक धारी गुंडों को चुटकी में मसल देता है... फ़िल्म देख कर ऐसा लगता है जैसे की हम कोई दक्षिण की फ़िल्म देख रहे हो। बाद में पता चला की ये दक्षिण की ब्लाकबस्टर फ़िल्म पोक्किरी का हिन्दी रूपांतरण है। आयशा टाकिया ने मिडिल क्लास की लड़की का रोल प्ले किया है, जिसे राधे से प्यार हो जाता है। वो जानती है की राधे गुंडा है लेकिन लोगो की मदद भी करता है। पर वो सोचती है की उसका प्यार राधे को बदल देगा। कहानी के अंत में पता चलता है राधे पुलिस ऑफिसर है। फ़िल्म में महेश मांजरेकर ने धूर्त पुलिस वाले का रोल बखूबी निभाया है...

कहानी भले ही पुरनी थी लेकिन मनोरंजन को प्रमुखता देने वाले प्रभुदेवा ने कहीं भी कहानी में उबाऊपण नही आने दिया। सलमान हीरो था तो निश्चित बात थी की थोडी बहुत तो फ़िल्म में टपोरी गिरी होगी उस तरह के संवाद भी होने सो थे और फ़िर शर्ट भी उतारी, सलमान ने अपना बदन भी खूब दिखाया .... फ़िल्म ठीक थी, पैसा बसूल। लेकिन मार-काट की अधिकता के चलते मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को शायद न खींच पाए। फिलहाल तो रेस्पोंसे अच्छा है... सिंगल स्क्रीन थियेटर में खूब भीड़ लग रही है... टिकिट ब्लैक भी हो रही है.... वैसे सलमान को एक अदद हित फ़िल्म की जरुरत थी और बोनी कपूर को पैसे बनने थे सो बना लिए। फ़िल्म का संगीत पक्ष बेहद कमजोर है.... कोई भी गाना जुबान पर नही चढा। शुरू के एक गाने में अनिल कपूर, गोविंदा और ख़ुद प्रभू देवा ने डांस किया।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

तालिबानी सोच का शिकार हो रहे है हिंदू, पाकिस्तान में

सारा जगत है सोया हुआ.....
सारे मानवाधिकारी छुपे बैठे है बिलों में.... या फ़िर लगे है अत्याचारियों को बचाने में....
१९४७-४८ में पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या १६% से २०% तक थी। यह मैं नही कह रहा ये पाकिस्तान की जन-गणना के आंकडे बताते है... लेकिन हिन्दुओ पर इन ६३ सालों में पाकिस्तान में इतने जुल्म ढाये गए की उन्हें या तो वहां से भाग कर अपनी जान और अपने परिजनों की जान बचानी पड़ी या फिर मौत को गले लगाना पड़ा... एक और रास्ता चुनना पड़ता था उसे पाकिस्तान के कठमुल्ले जबरन थोपते थे... इस्लाम। हिदुओं को जबरन मुस्लिम बनाया जाता... वहां इन सब जुल्मों के चलते हालात ये हो गयी है की पाकिस्तान में हिन्दुओ की जनसँख्या घटकर १.६% से भी कम रह गयी है.... वहां हिन्दुओं को अपनी सम्पति छोड़ कर भागना पड़ा है... अपनी बहु- बेटिओं की इज्जत खोनी पड़ी है.... पर इस पर दुनिया में तो क्या भारत में भी कोई हल्ला नहीं बोलेगा... हाल के वर्षों में वहां क्या कुछ हुआ है जरा नीचे पढें साथ ही मेरा पुराना लेख कोई तो सुने इनकी पुकार को भी पढ़ें ............
पिछले चार सालों में पाकिस्तान से करीब 5 हजार हिंदू तालिबान के डर कर भारत आ गए, कभी वापस न जाने के लिए। अपना घर, अपना सबकुछ छोड़कर, यहां तक की अपना परिवार तक छोड़कर, आना आसान नहीं है। लेकिन इन लोगों का कहना है कि उनके पास वहां से भागने के अलावा कोई चारा नहीं था। 2006 में पहली बार भारत-पाकिस्तान के बीच थार एक्सप्रेस की शुरुआत की गई थी। हफ्ते में एक बार चलनी वाली यह ट्रेन कराची से चलती है भारत में बाड़मेर के मुनाबाओ बॉर्डर से दाखिल होकर जोधपुर तक जाती है। पहले साल में 392 हिंदू इस ट्रेन के जरिए भारत आए। 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 880 हो गया। पिछले साल कुल 1240 पाकिस्तानी हिंदू भारत जबकि इस साल अगस्त तक एक हजार लोग भारत आए और वापस नहीं गए हैं। वह इस उम्मीद में यहां रह रहे हैं कि शायद उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाए, इसलिए वह लगातार अपने वीजा की अवधि बढ़ा रहे हैं। गौर करने लायक बात यह है कि यह आंकड़े आधिकारिक हैं, जबकि सूत्रों का कहना है कि ऐसे लोगों की संख्या कहीं अधिक है जो पाकिस्तान से यहां आए और स्थानीय लोगों में मिल कर अब स्थानीय निवासी बन कर रह रहे हैं। अधिकारियों का इन विस्थापितों के प्रति नरम व्यवहार है क्योंकि इनमें से ज्यादातर लोग पाकिस्तान में भयावह स्थिति से गुजरे हैं। वह दिल दहला देने वाली कहानियां सुनाते हैं।
इन्हें भी पढ़ें
रेलवे स्टेशन के इमिग्रेशन ऑफिसर हेतुदन चरण का कहना है, 'भारत आने वाले शरणार्थियों की संख्या अचानक बढ़ गई है। हर हफ्ते 15-16 परिवार यहां आ रहे हैं। लेकिन इनमें से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि वह यहां बसने के इरादे से आए हैं। लेकिन आप उनका सामान देखकर आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि वह शायद अब वापस नहीं लौटेंगे।' राना राम पाकिस्तान के पंजाब में स्थित रहीमयार जिले में अपने परिवार के साथ रहता था। अपनी कहानी सुनाते हुए उसने कहा- वह तालिबान के कब्जे में था। उसकी बीवी को तालिबान ने अगवा कर लिया। उसके साथ रेप किया और उसे जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया। इतना ही नहीं, उसकी दोनों बेटियों को भी इस्लाम कबूल करवाया। यहां तक की जान जाने के डर से उसने भी इस्लाम कबूल कर लिया। इसके बाद उसने वहां से भागना ही बेहतर समझा और वह अपनी दोनों बेटियों के साथ भारत भाग आया। उसकी पत्नी का अभी तक कोई अता पता नहीं है। एक और विस्थापित डूंगाराम ने कहा- पिछले दो सालों में हिंदुओं के साथ अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं खासकर परवेज़ मुशर्रफ के जाने के बाद। अब कट्टरपंथी काफी सक्रिय हो गए हैं... हम लोगों को तब स्थायी नौकरी नहीं दी जाती थी, जब तक हम इस्लाम कबूल न कर लें। बाड़मेर और जैसलमेर में शरणार्थियों के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा कहते हैं- भारत में शरणार्थियों के लिए कोई पॉलिसी नहीं है। यही कारण है कि पाकिस्तान से भारी संख्या में लोग भारत आ रहे हैं। सोढ़ा ने कहा- पाकिस्तान के साथ बातचीत में भारत सरकार शायद ही कभी पाकिस्तान में हिदुंओं के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार व अत्याचार का मुद्दा नहीं उठाती है। उन्होंने कहा- 2004-05 में 135 शरणार्थी परिवारों को भारत की नागरिकता दी गई, लेकिन बाकी लोग अभी भी अवैध तरीके से यहां रह रहे हैं। यहां पुलिस इन लोगों पर अत्याचार करती है। उन्होंने कहा- पाकिस्तान के मीरपुर खास शहर में दिसंबर 2008 में करीब 200 हिदुओं को इस्लाम धर्म कबूल करवाया गया। बहुत से लोग ऐसे हैं जो हिंदू धर्म नहीं छोड़ना चाहते लेकिन वहां उनके लिए सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं।