शनिवार, 4 अप्रैल 2009

मेरे गांव का मेला, बडा रंगीला


मंदिर परिसर के अन्दर का द्रश्य और मेले में उमड़ी भीड़ की झलक


मेरे गांव के आस-पास के इलाके में तीन-चार मेले लगते हैं। सभी चैत्र में ही लगते हैं। नवदुर्गा में शक्ति उपासना के बाद अष्टमी, नौमी के दिन ये मेले लगते हैं सभी मेले किसी देवी माँ के आंगन में ही लगते हैं। मेरा दोस्त भी मेरे साथ आज मेला देखने गया था। वह एकाएक मुझसे पूछता है कि भाई आज गर्मी बहुत हो रही है गांव वाले इस मेले का आयोजन सर्दियों में क्यों नहीं करते। तब मैंने उसे बताया- भाई इस मेले में हजारों लोगों की जो भीड़ दिख रही है वे सब इस धरती माँ के लाडले बेटे हैं जो उसके आंचल में फसल उगाते हैं और सब के पेट भरने की व्यवस्था करते हैं। ये सभी लाड़ले बेटे इसी समय फुरसत में होते हैं। जहां ये मेला लग रहा है वहां सर्दियों में खेती होती है। सभी किसान खेती में व्यस्त रहते हैं उनके पास समय नहीं रहता और तो और उस समय उनके पास उत्सव मनाने के लिए पैसा भी नहीं होता। चैत्र में किसान की फसल आती है वह उसे बेच कर अपनी हथेली पर कुछ रूपये पाता है तब उसका मन भी उत्सव मनाने के लिए व्याकुल होता है और वह धू से उत्सव मनाता है पूरे नौ दिन का। नववर्ष के पहले दिन से दशमी तक दिल खोल कर उत्सव मनाता है। बस यही कारण है इन दिनों मेले का आयोजन करने का।

अब चलो मैं अपने गांव के मेले का वर्णन करता हूँ- यूं तो मेरा गांव
का नाम झांकरी है और आज के इस मेले का आयोजन पास ही के एक अन्य गांव ककरधा में किया गया यहां वर्षों पुराना मंदिर है - बसईया वाली माता का मंदिर। जिसकी छत्र छाया में इस मेले का आयोजन किया जाता है। माता के मेले में सभी समाज, जाति, धर्म के लोग आते हैं मेला सुबह से शुरू हो जाता है दिन चढ़ते-चढ़ते लोगों की संख्या बढ़ती जाती है। मेले में जिधर देखूं उधर श्रद्धालू चाट-पकौडी के ढेले, बेर बेचते साईकिल वाले-बर्फ वाले और ठण्डा-गर्म सब मिल रहा था।

गांव के मेले की एक नहीं अनेक खाशियत हैं मेला परिसर में कदम रखने से पहले ही आपके चेहरे पर फोकट का पाउडर लगने लगता है अरे भई! खेतों की उड़ती धूल थोडे ही देखती है कि आप कौन की बहुराष्ट्रीय या राष्ट्रीय कंपनी का पाउडर लगाते हैं। यहाँ तो आपको सूट करे या न करे एक ही पाउडर लगेगा चाहे आप अपने चेहरे को कितना ही बचाने की कोशिश करें। बच नहीं पाएगें। इधर धूल उडती है उधर चाट बन रही होती है। मैंने देखा कि चाट बनाने वाला जितने मसाले नहीं मिला पाता होगा उतनी उसमें धरती से उडी धूल मिल जाती है। फिर भी लोग मजे से खाते हैं और बच्चे तो अगर नहीं दिलाई तो रोने लगते हैं। आस-पास के गांव से लोग बैलगाडियों में, ट्रेक्टर में, जीप आदि में भर-भर कर आते हैं। पार्किंग की भी गजब व्यवस्था है बिना किसी प्रशासन की मदद के सुव्यवस्थित रहती है। इतनी सुव्यवस्थित कि हर बंदे को पता होता है कि कहाँ किस गांव के ट्रेक्टर-गाडी खडी होंगी। शहर से भी कोई पहुचता है तो उसे रेडियो रूम से अनाउन्स नहीं करवाना पड़ता कि फला व्यक्ति कहाँ पर है। वैसे वहाँ रेडियो रूम होता भी नहीं है। हर साल यथा स्थान लोग अपने वाहन खड़े करते हैं। गांव से लोग हलवा, पूड़ी, सब्जी, विभिन्न प्रकार के व्यंजन बना कर लाते हैं और सब मिल जुल कर खाते हैं। लडकियों और छोटे बच्चों के बड़े मजे होते हैं। क्यों? अरे भई! उन्हें सभी बड़े लोग मेला देखने के लिए पैसे देते हैं। मै छोटा था तब मुझे भी मिलते थे पर आज तो उल्टा हुआ, मेले में पंहुचते ही जेब ढीली हो गयी और जब तक मेले में रहा छोटे भाई-बहन, भतीजे-भान्जे जिद पर रहे। हाथी दिला दो, घोड़ा दिला दो, ट्रेक्टर, गाड़ी दिला दो। कैसे-कैसे पीछा छुडया मैं ही जानता हूँ।
सभी आने वाले लोग माँ बसईया वाली के दर्शन को जाते और अपनी मनोकामनाएं उसके समक्ष रखते। अच्छा एक बात ओर गांव वाले माता रानी को खुश करने के लिए नेजा और जवारे लेकर आते हैं। ( नेजा- ध्वज पताका, 15 से 20 फीट लम्बे बांस को रंगीन वस्त्रों में लपेटकर उस पर गुब्बारे, खिलौने आलि से उसे सजा कर लाया जाता है। जवारे- धान के अंकुर)। सभी गांव वालों में हौड रहती है कि किस गांव की ओर से कितना ऊंचा नेजा माता के दरबार में लाया जाएगा।
गांव के मेले में सभी प्रकार की दुकानों का प्रबंध रहता है। विशेष रहता है महिलाओं के श्रंृगार की सामाग्री का। महिलाओं की सौदर्य प्रसाधनों की दुकानों का आयोजन अलग सेक्शन में होता है। अगर आप पुरूष हैं तो भूल कर भी वहां मत जाना। वरना पुलिस बैंड बजा देगी।
जैसे-जैसे सांझ ढलने लगती है लोग अपने घरों की ओर लौटने लगते हैं, साथ ही मेले का एक अन्य आकर्षण की तैयारी भी तेज होने लगती है। वो है- दंगल। दूर-दूर स्थानों से प्रत्येक वर्ष दंगल में कुश्ती लडने के लिए पहलवान आते हैं। दंगल में जब पहलवानो का नाम पुकारा जाता है तो अनायस ही बचपन में पढ़ी कविता - कोई पहलवान अंबाले का, कोई पहलवान पटियाले का, की याद आ जाती है। दंगल में पहलवाने के लिए ईनाम की जो बोली लगाई जाती है उसे झंडी कहते हैं। गबरू-गबरू जवान जब कुश्ती करते हैं तो धरती का भी सीना डोलने लगता है। और कुश्ती के आयोजन के पश्चात मेला समाप्त हो जाता है। लोग अपने वाहनों से घर की ओर भागने लगते हैं। जब गांवो में यांत्रिक वाहनो की इतनी पंहुच नहीं थी तब की यादें आज भी ताजा है। गांव वाले मेले से लौटते में बैल गाडियों की रेस लगाते थे। इस रेस में जीतने के लिए सभी किसान अपने बैलों को पूरे साल भर खूब खिलाते-पिलाते थे। लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। हम आधुनिक हो गये हैं न।

5 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अच्छी पोस्ट है...........
सही कहा अब वो दिन नहीं रहे

RC ने कहा…

Thanks for joining my blog. My new blog's link is
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God bless
RC

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

बहुत खूब ,अच्छा शब्द चित्र उकेरा है । बधाई

www.जीवन के अनुभव ने कहा…

बहुत ही सजीव ओर मनमोहक चित्रण जो मन को उस ओर खीचनें पर मजबूर कर दे।

www.जीवन के अनुभव ने कहा…

बहुत ही सजीव ओर मनमोहक चित्रण जो मन को उस ओर खीचनें पर मजबूर कर दे।