शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मैंने भारत को करीब से देखा है




मैंने भारत को करीब से देखा है
बहुत करीब से देखा है.
रोटी के लिए बिलखते भी देखा है
किन्तु स्वाभिमान के साथ जीते देखा है
मानवता उसकी रग-रग में है
स्वंम कष्ट में होते हुए भी दूसरों के ज़ख्मों को सीते देखा है, दर्द समेटते देखा है. ०१

विश्व मार्गदर्शक के रूप में स्वर्णिम इतिहास देखा है
तो संघर्षमय, पीढा, वेदना से भरा प्रष्ट भी देखा है
पाश्चात्य संस्कृति के दलदल में फंसा ही सही
किन्तु अब इससे उभरता हुआ अपनी जड़ों में लौटते देखा है, परम वैभव कि ओर बढ़ते देखा है। ०२

शस्य-श्यामल भाल आतंक में लहू-लुहान देखा है
आँचल में भी अलगाव का दर्द देखा है
भाषा-जाति-धर्म को लेकर लड़ते ही सही
किन्तु राष्ट्रिय एकता-अखंडता के लिए
साथ-साथ चलते देखा है, राष्ट्र चेतना का नव सृजन करते देखा है। ०३

शान्ति उपवन का निर्माण करते देखा है
विश्व कल्याणी कार्य में संलग्न देखा है
पंचशील के सिध्यांत का संस्थापक ही सही
किन्तु स्व-अस्तित्व पर उठे संकट कोई
तो सिंह से दहाड़ते देखा है, शत्रु का मर्दन करते देखा है। ०४

आतंक, नक्शलवाद से जूझते देखा है
स्वसंतान के कारण उठे प्रश्नों में उलझते देखा है
फिर भी हर क्षण उसकी आँखों में चमक
समर्थ विश्वगुरु बनने का
सशक्त स्वप्न देखा है, प्रशस्त कर्मपथ देखा है. ०५








2 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुंदर और सच्ची बात ..शुक्रिया

www.जीवन के अनुभव ने कहा…

waha kya baat hai aapke lekhan mai jise mahasus bhi kiya jaa sakata hai.