जिन्दादिली का अहसास है ‘दिल दुखना’
>> मंगलवार, २९ सितम्बर २००९

वर्ल्ड हार्ट डे
क्या बात है जी? रोज... डे,.....डे,......डे और आज वर्ल्ड हार्ट डे। अब आज सारे हृदयरोग याद आएगें। स्वास्थ्य संगठन, लेखक व पत्रकारो को रपट बनाने का मौका मिलेगा। सब अपने-अपने स्तर के आंकडे जुटाएगें कि इतना हजार व्यक्ति इस राज्य में, उतना उस राज्य में और पूरे भारत या विश्व में कुल इतने लाख लोग हृदय रोगों से पीड़ित हैं। खैर अपने को इससे कोई मतलब नहीं। आप सोच रहे होगे कि मैं दिल का मरीज नहीं हूं इसलिए मुझे इससे कोई मतलब नहीं। ऐसा ही सोच रहे हो ना?
इधर कान लाओं, लेकिन पहले वादा करो किसी से कहोगे नहीं, पक्का नहीं कहोगे ना। असल में मुझे भी दिल की बीमारी है। पता है मेरा दिल बहुत दुखता है इसीलिए तो मैंने अपने ब्लाॅग का नाम भी रख लिया ’दिल दुखता है’
यार मैं बहुत परेशान हूं ‘दिल के दर्द’ से। अभी जवानी है खेलने-कूदने के दिन है, कुछ रचनात्मक कार्य करने दिन है पर, दिल है कि मानता नहीं। हमेशा उल्टी दिशा में, गलत जगह ध्यान देता है फिर दुखता है। खुद भी परेशान रहता और सवा पांच फुट के शरीर को भी फोकट में टेंशन देता हैं। अब आप ही बताओ भला इस उम्र में इसे क्या जरूरत है राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंता करने की। धर्म-अधर्म, गरीबी-भूखमरी की। क्या जरूरत है समाज के पचडे में टांग अड़ाने की। देखो जो चल रहा है वो तो चल ही रहा है किसी के उंगली करने से कुछ हो सकता है क्या? अच्छे-अच्छे मर गए, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, सुभाषचन्द्र, महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय इनके सुधारने से भी कुछ हुआ क्या? गांधी ने लाख कहा था ‘सुराज’ पर चलो, ‘स्वदेशी’ बनों, बताओ कहां चल रहे हैं हम?
मुझे पता है आपके दिमाग मे भी यहीं आया होगा कुछ तो नहीं बदला। कोई परिवर्तन तो नहीं आया। तो भाई ये भी गलत है परिवर्तन तो आता ही है। आया है तभी तो हमारा-तुम्हारा दिल दुखता है। अगर उनका दिल न दुखा होता तो हमारे दिल को कहां से दुखने की प्रेरणा मिलती। आपको पता है ‘दिमाग स्वार्थी होता है।’ बनिया हमेशा दिमाग से सोचता है लेकिन दिल के साथ ऐसा नहीं दिल में ही तो ‘दुनिया का दर्द’ पलता है। याद है कहावत ‘ये पत्थर दिल है’। किसी की पीढ़ा देखकर उसकी मदद के लिए आगे नही आने वाले के लिए कही जाती है। दिल ही तो दूसरो के लिए धड़कता है दिमाग सिर्फ अपने लिए। तभी तो ये कहावत नही बनी कि ‘इसका दिमाग पत्थर’ है।
लोग कहते भी है आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक धडकता है’ पर मेरा मानना कुछ अलग है असल में आदमी तभी तक जिन्दा रहता है जब तक उसका ‘दिल दुखता है। तो भाई जिन्दगी जिंदादिली के साथ जीना है तो दिल को दुखाओ पर याद रखना दिल दूसरो के किए दुखे जिस दिन खुद किया दुखा तो लेने के देने पड़ जाएगें। बस थोडी सी सावधानी के साथ धडकने दो दिल को दुखने दो दिल को। जाते-जाते तुलसीदास जी की बात याद आ गई
पर पीढ़ा सम नहीं अधिमाई’’
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